सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 1 - अपने आप को अल्लाह के सामने ज़लील समझने की दुआ 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ मेरे परवरदिगार! मेरे गुनाहों ने मुझे (उज़्र ख़्वाही से) चुप कर दिया है, मेरी गुफ़्तगू भी दम तोड़ चुकी है। तो अब मैं कोई उज़्र व हुज्जत नहीं रखता। इस तरह मैं अपने रन्ज व मुसीबत में गिरफ़्तार अपने आमाल के हाथों में गिरवी अपने गुनाहों में हैरान व परेशान, मक़सद से सरगर्दान और मन्ज़िल से दूर उफ़तादा हूँ। मैंने अपने के ज़लील गुनहगारों के मौक़ुफ़ पर ला खड़ा किया है। इन बदबख़्तों के मौक़ुफ़ पर जो तेरे मुक़ाबले में जराएत दिखाने वाले और तेरे वादे को सरसरी समझने वाले हैं, पाक है तेरी ज़ात। मैंने किस जराअत व दिलेरी के साथ तेरे मुक़ाबले में जराअत की है और किस तबाही व बरबादी के साथ अपनी हलाकत का सामान किया है। ऐ मेरे मालिक, मेरे मुंह के बल गिरने और क़दमों के ठोकर खाने पर रहम फ़रमा और अपने हिल्म से मेरी जेहालत व नादानी को और अपने एहसान से मेरी ख़ता व बदआमाली को बख़्श दे इसलिये के मैं अपने गुनाहों का मोक़िर और अपनी ख़ताओं का मोतरफ़ हूं यह मेरा हाथ और यह मेरी पेशानी के बाल (तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में) हैं। मैंने अज्ज़ व सराफ़गन्दगी के साथ अपने को क़ेसास के लिये पेश कर दिया है। बारे इलाहा! मेरे बुढ़ापे, ज़िन्दगी के दिनों के बीत जाने, मौत के सर पर मण्डलाने और मेरी नातवान, आजिज़ी और बेचारगी पर रहम फ़रमा। ऐ मेरे मालिक, जब दुनिया से मेरा नाम व निशान मिट जाए और लोगों (के दिलों) से मेरी याद महो हो जाए और उन लोगों की तरह जिन्हें भुला दिया जाता है मैं भी भुला दिये जाने वालों में से हो जाऊं तो मुझ पर रहम फ़रमाना। ऐ मेरे मालिक! मेरी सूरत व हालत के बदल जाने के वक़्त जब मेरा जिस्म कोहनहू आज़ा दरहम बरहम और जोड़ व बन्द अलग अलग हो जाएं तो मुझ पर तरस खाना। हाए मेरी ग़फ़लत व बेख़बरी उससे जो अब मेरे लिये चाहा जा रहा है और ऐ मेरे मौला! हश्र व नशरत के हंगाम मुझ पर रहम करना और उस दिन मेरा क़याम अपने दोस्तों के साथ और (मौक़फ़े हिसाब से महले जज़ा की तरफ़) मेरी वापसी अपने दोस्तदारों के हमराह और मेरी मन्ज़िल अपनी हमसायगी में क़रार देना। ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार।

 

رَبِّ أَفْحَمَتْنِيْ ذُنُوبِي، وَانْقَطَعَتْ مَقَالَتِي، فَلاَ حُجَّةَ لِي، فَأَنَا الأَسِيـرُ بِبَلِيَّتِي، الْمُـرْتَهَنُ بِعَمَلِي، الْمُتَرَدِّدُ فِي خَطِيئَتِي، الْمُتَحَيِّرُ عَنْ قَصْدِي، الْمُنْقَطَعُ بِي، قَدْ أَوْقَفْتُ نَفْسِي مَوْقِفَ الأَذِلاَّءِ الْمُذْنِبِينَ، مَوْقِفَ الأَشْقِيآءِ الْمُتَجَرِّينَ عَلَيْكَ، الْمُسْتَخِفِّينَ بِوَعْدِكَ. سُبْحَانَكَ! أَيَّ جُرْأَة اجْتَرَأْتُ عَلَيْكَ؟ وَأَيَّ تَغْرِير غَرَّرْتُ بِنَفْسِي مَوْلاَيَ إرْحَمْ كَبْوَتِيْ لِحُرِّ وَجْهِي، وَزَلَّةَ قَدَمِي، وَعُدْ بِحِلْمِكَ عَلَى جَهْلِي، وَبِإحْسَانِكَ عَلَى إسَآءَتِي، فَأَنَا الْمُقِرُّ بِذَنْبِي، الْمُعْتَرِفُ بِخَطِيئَتِي، وَهَذِهِ يَدِيْ وَنَاصِيَتِي، أَسْتَكِينُ بِالْقَـوْدِ مِنْ نَفْسِي . إرْحَمْ شَيْبَتِي، وَنَفَادَ أَيَّامِي، وَاقْتِرَابَ أَجَلِي، وَضَعْفِي، وَمَسْكَنَتِي، وَقِلَّةَ حِيلَتِي. مَوْلاَيَ وَارْحَمْنِي إذَا انْقَطَعَ مِنَ الدُّنْيَا أَثَرِي، وَامَّحى مِنَ الْمَخْلُوقِينَ ذِكْرِي، وَكُنْتُ فِي الْمَنْسِيِّينَ، كَمَنْ قَدْ نُسِيَ. مَوْلاَيَ وَارْحَمْنِي عِنْدَ تَغَيُّرِ صُورَتِي وَحَالِي إذَا بَلِيَ جِسْمِي، وَتَفَرَّقَتْ عْضَائِي،وَتَقَطَّعَتْ أَوْصَالِيْ، يا غَفْلَتِي عَمَّا يُرَادُ بِيَ. مَوْلاَيَ وَارْحَمْنِي فِي حَشْرِي وَنَشْرِي، وَاجْعَل فِي ذَلِكَ الْيَومِ مَعَ أَوْلِيَآئِكَ مَوْقِفِي، وَفِي أَحِبَّائِكَ مَصْدَرِي، وَفِي جِوَارِكَ مَسْكَنِي يَا رَبَّ الْعَالَمِينَ. 

 

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