सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 50 - ख़ौफ़ इलाही के सिलसिले में दुआ 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

बारे इलाहा! तूने मुझे इस तरह पैदा किया के मेरा आज़ा बिल्कुल सही व सालिम थे, और जब कमसिन था, तो मेरी परवरिश का सामान किया और बे रन्ज व काविश रिज़्क़ दिया। बारे इलाहा! तूने जिस किताब को नाज़िल किया और जिसके ज़रिये अपने बन्दों को नवेद व बशारत दी, उसमें तेरे इस इरशाद को देखा है के ऐ मेरे बन्दों! जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की है, तुम अल्लाह तआला की रहमत से ना उम्मीद न होना। यक़ीनन अल्लाह तुम्हारे तमाम गुनाह मुआफ़ कर देगा इससे पेशतर मुझसे ऐसे गुनाह सरज़द हो चुके हैं जिनसे तू वाक़िफ़ है और जिन्हें तू मुझसे ज़्यादा जानता है। वाए बदबख़्ती व रूसवाई उन गुनाहों के हाथों जिन्हें तेरी किताब क़लमबन्द किये हुए है अगर तेरे हमहगीर अफ़ो व दरगुज़र के वह मवाक़ेअ न होते जिनका मैं उम्मीदवार हूं तो मैं अपने हाथों अपनी हलाकत का सामान कर चुका था। अगर कोई एक भी अपने परवरदिगार से निकल भागने पर क़ादिर होता तो मैं तुझसे भागने का ज़्यादा सज़ावार था। और तू वह है जिससे ज़मीन व आसमान के अन्दर कोई राज़ मख़फ़ी नहीं है मगर यह के तू (क़यामत के दिन) उसे ला हाज़िर करेगा। तू जज़ा देने और हिसाब करने के लिये बहुत काफ़ी है। ऐ अल्लाह! मैं अगर भागना चाहूं तो तू मुझे ढूंढ लेगा, अगर राहे गुरेज़ इख़्तियार करूं, तो तू मुझे पा लेगा। ले देख मैं आजिज़, ज़लील और शिकस्ता हाल तेरे सामने खड़ा हूं, अगर तू अज़ाब करे तो मैं उसका सज़ावार हूं। ऐ मेरे परवरदिगार! यह तेरी जानिब से ऐन अद्ल है और अगर तू मुआफ़ कर दे तो तेरा अफ़ो व दरगुज़र हमेशा मेरे शामिले हाल रहा है। और तूने सेहत व सलामती के लिबास मुझे पहनाए हैं। बारे इलाहा! मैं तेरे उन पोशीदा नामों के वसीले से और तेरी उस बुज़ुर्गी के वास्ते से जो (जलाल व अज़मत के) पर्दों  में मख़फ़ी है  तुझसे यह सवाल करता हूं के इस बेताब नफ़्स और बेक़रार हड्डियों के ढांचे पर तरस खा (इसलिये के) जो तेरे सूरज की तपिश को बरदाश्त नहीं कर सकता वह तेरे जहन्नुम की तेज़ी को कैसे बरदाश्त करेगा और जो तेरे बादल की गरज से कांप उठता है तो वह तेरे ग़ज़ब की आवाज़ को कैसे सुन सकता है। लेहाज़ा मेरे हाले ज़ार पर रहम फ़रमा इसलिये के ऐ मेरे माबूद! मैं एक हक़ीर फ़र्द हूं जिसका मरतबा पस्ततर है और मुझ पर अज़ाब करना तेरी सल्तनत में ज़र्रा भर इज़ाफ़ा नहीं कर सकता और अगर मुझे अज़ाब करना तेरी सल्तनत को बढ़ा देता तो मैं तुझसे अज़ाब पर सब्र व शिकेबाई का सवाल करता और यह चाहता के वह इज़ाफ़ा तुझे हासिल हो। लेकिन ऐ मेरे माबूद! तेरी सल्तनत इससे ज़्यादा अज़ीम और इससे ज़्यादा दवाम पज़ीद है के फ़रमांबरदारों की इताअत इसमें कुछ इज़ाफ़ा कर सके या गुनहगारों की मासियत इसमें से कुछ घटा सके। तो फिर ऐ तमाम रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले मुझ पर रहम फ़रमा और ऐ जलाल व बुज़ुर्गी वाले मुझसे दरगुज़र कर और मेरी तौबा क़ुबूल फ़रमा। बेशक तू तौबा क़ुबूल करने वाला और रहम करने वाला है।

 

أَللَّهُمَّ إنَّكَ خَلَقْتَنِي سَوِيّاً، وَرَبَّيْتَنِي صَغِيراً، وَرَزَقْتَنِي مَكْفِيّاً. أَللَّهُمَّ إنِّي وَجَدْتُ فِيمَا أَنْزَلْتَ مِنْ كِتَابِكَ، وَبَشَّرْتَ بِهِ عِبَادِكَ، أَنْ قُلْتَ: (يا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لاَ تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللهِ إنَّ اللهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعاً) وَقَدْ تَقَدَّمَ مِنِّي مَا قَدْ عَلِمْتَ، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي، فَيَا سَوْأَتا مِمَّا أَحْصَاهُ عَلَيَّ كِتَابُكَ، فَلَوْلاَ الْمَوَاقِفُ الَّتِي أُؤَمِّلُ مِنْ عَفْوِكَ الَّذِي شَمِلَ كُلَّ شَيْء لاَلْقَيْتُ بِيَدِي، وَلَوْ أَنَّ أَحَداً اسْتَطاعَ الْهَرَبَ مِنْ رَبِّهِ لَكُنْتُ أَنَا أَحَقُّ بِالهَرَبِ، وَأَنْتَ لاَ تَخْفَى عَلَيْكَ خَافِيَةٌ فِي الاَرْضِ وَلاَ فِي السَّمَآءِ إلاَّ أَتَيْتَ بِهَا، وَكَفى بِكَ جَازِياً، وَكَفى بِكَ حَسِيباً. أللَّهُمَّ إنَّكَ طَالِبِي إنْ أَنَا هَرَبْتُ، وَمُدْرِكِي إنْ أَنَا فَرَرْتُ، فَهَا أَنَا ذَا بَيْنَ يَدَيْكَ خَاضِعٌ ذَلِيلٌ رَاغِمٌ، إنْ تُعَذِّبْنِي فَإنّي لِذلِكَ أَهْلٌ، وَهُوَ يَارَبِّ مِنْكَ عَدْلٌ، وَإنْ تَعْفُ عَنِّي فَقَدِيماً شَمَلَنِي عَفْوُكَ، سْتَنِي عَافِيَتَكَ. فَأَسْأَلُكَ اللَّهُمَّ بِالْمَخْزونِ مِنْ أَسْمائِكَ، وَبِمَا وَارتْهُ الْحُجُبُ مِنْ بَهَائِكَ، إلاَّ رَحِمْتَ هذِهِ النَّفْسَ الْجَزُوعَةَ، وَهَذِهِ الرِّمَّةَ الْهَلُوعَةَ، الَّتِي لاَ تَسْتَطِيعُ حَرَّ شَمْسِكَ، فَكَيْفَ تَسْتَطِيعُ حَرَّ نارِكَ؟ وَالَّتِي لاَ تَسْتَطِيعُ صَوْتَ رَعْدِكَ، فَكَيْفَ تَسْتَطِيعُ صَوْتَ غَضَبِكَ؟ فَارْحَمْنِي اللَّهُمَّ فَإنِّي امْرُؤٌ حَقِيرٌ، وَخَطَرِي يَسِيرٌ، وَلَيْسَ عَذَابِي مِمَّا يَزِيدُ فِي مُلْكِكَ مِثْقَالَ ذَرَّة، وَلَوْ أَنَّ عَذَابِي مِمَّا يَزِيدُ فِي مُلْكِكَ لَسَأَلْتُكَ الصَّبْرَ عَلَيْهِ، وَأَحْبَبْتُ أَنْ يَكُونَ ذلِكَ لَكَ، وَلكِنْ سُلْطَانُكَ اللَّهُمَّ أَعْظَمُ،  وَمُلْكُكَ أَدْوَمُ مِنْ أَنْ تَزِيـدَ فِيْهِ طَاعَةُ الْمُطِيعِينَ، أَوْ تُنْقِصَ مِنْهُ مَعْصِيَةُ الْمُذْنِبِينَ.  فَارْحَمْنِي يا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ، وَتَجاوَزْ عَنِّي يا ذَا الْجَلاَلِ وَالإكْرَامِ، وَتُبْ عَلَيَّ إنَّكَ أَنْتَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ. 

 

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