सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 38 - बन्दों की हक़तलफ़ी और उनके हुक़ूक़ में कोताही से माफ़ी और मग़फ़ेरत तलबी और दोज़ख़ से गुलू ख़लासी के लिये दुआ

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

बारे इलाहा! मैं उस मज़लूम की निस्बत जिस पर मेरे सामने ज़ुल्म किया गया हो और मैंने उसकी मदद न की हो और मेरे साथ कोई नेकी की गई हो और मैंने उसका शुक्रिया अदा न किया हो और उस बदसुलूकी करने वाले की बाबत जिसने मुझसे माज़ेरत की हो और मैंने उसके उज़्र को न माना हो, और फ़ाक़ाकश के बारे में जिसने मुझसे मांगा हो और मैंने उसे तरजीह न दी हो और उस हक़दार मोमिन के हक़ के मुताल्लिक़ जो मेरे ज़िम्मे हो और मैंने अदा न किया हो और उस मर्दे मोमिन के बारे में जिसका कोई ऐब मुझ पर ज़ाहिर हुआ हो और मैंने उस पर पर्दा न डाला हो। और हर उस गुनाह से जिससे मुझे वास्ता पड़ा हो और मैंने उससे किनाराकशी न की हो, तुझसे उज़्रख़्वाह हूं। 

बारे इलाहा! मैं उन तमाम बातों से और उन जैसी दूसरी बातों से शर्मसारी व निदामत के साथ ऐसी माज़ेरत करता हूं जो मेरे लिये उन जैसी पेश आईन्द चीज़ों के लिये पन्द व नसीहत करने वाली हो। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और लग़्िज़शों से जिनसे मैं दो-चार हुआ हूं मेरी पशेमानी को और पेश आने वाली बुराईयों से दस्तबरदार होने के इरादे को ऐसी तौबा क़रार दे जो मेरे लिये तेरी मोहब्बत का बाएस हो। ऐ तौबा करने वालों को दोस्त रखने वाले।

 

أَللَّهُمَّ إنِّي أَعْتَـذِرُ إلَيْـكَ مِنْ مَـظْلُوم ظُلِمَ بِحَضْرَتِي فَلَمْ أَنْصُرْهُ، وَمِنْ مَعْرُوف أُسْدِيَ إلَيَّ فَلَمْ أَشْكُرْهُ، وَمِنْ مُسِيء أعْتَذَرَ إلَيَّ فَلَمْ أَعْذِرْهُ، وَمِنْ ذِيْ فَاقَة سَأَلَنِي فَلَمْ اُوثِرْهُ، وَمِنْ حَقِّ ذي حَقٍّ لَزِمَنِي لِمُؤْمِن فَلَمْ أوَفِّـرْهُ، وَمِنْ عَيْبِ مُؤْمِن ظَهَر لِي فَلَمْ أَسْتُرْهُ، وَمِنْ كُلِّ إثْم عَرَضَ لِيْ فَلَمْ أَهْجُرْهُ. أَعْتَذِرُ إلَيْكَ يَا إلهِي مِنْهُنَّ وَمِنْ نَظَائِرِهِنَّ اعْتِذَارَ نَدَامَة يَكُونُ وَاعِظاً لِمَا بَيْنَ يَدَيَّ مِنْ أَشْبَاهِهِنَّ. فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَاجْعَلْ نَدَامَتِي عَلَى مَا وَقَعْتُ فِيهِ مِنَ الـزَّلاّتِ وَعَزْمِي عَلَى تَـرْكِ مَا يَعْـرِضُ لِيْ مِنَ السَّيِّئـاتِ تَوبَةً تُوجِبُ لِيْ مَحَبَّتَـكَ يا مُحِبَّ التَّوَّابِيْنَ.

 

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