सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 37 - जब अदाए शुक्र में कोताही को क़बूल करते तो यह दुआ पढ़ते 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

बारे इलाहा! कोई शख़्स तेरे शुक्र की किसी मन्ज़िल तक नहीं पहुंचा मगर यह के तेरे इतने एहसानात मुजतमअ हो जाते हैं के वह इस पर मज़ीद शुक्रिया लाज़िम व वाजिब कर देते हैं और कोई शख़्स तेरी इताअत के किसी दरजे पर चाहे वह कितनी ही सरगर्मी दिखाए, नहीं पहुंच सकता और तेरे इस इस्तेहक़ाक़ के मुक़ाबले में जो बरबिनाए फ़ज़्ल व एहसान है, क़ासिर ही रहता है, जब यह सूरत है तो तेरे सबसे ज़्यादा शुक्रगुज़ार बन्दे भी अदाए शुक्र से आजिज़ और सबसे ज़्यादा इबादतगुज़ार भी दरमान्दा साबित होंगे। कोई इस्तेहक़ाक़ ही नहीं रखता के तू उसके इस्तेहक़ाक़ की बिना पर, बख़्श दे या उसके हक़ की वजह से उससे ख़ुश हो, जिसे तूने बख़्श दिया तो यह तेरा इनआम है, और जिससे तू राज़ी हो गया तो यह तेरा फ़ज़्ल है। जिस अमले क़लील को तू क़ुबूल फ़रमाता है उसकी जज़ा फ़रावां देता है और मुख़्तसर इबादत पर भी सवाब मरहमत फ़रमाता है यहां तक के गोया बन्दों का वह शुक्र बजा लाना जिसके मुक़ाबले में तूने अज्र व सवाब को ज़रूरी क़रार दिया और जिसके एवज़ उनको अज्र अज़ीम अता किया एक ऐसी बात थी के इस शुक्र से दस्ता बरदार होना उनके इख़्तियार में था तो इस लेहाज़ से तूने अज्र दिया (के उन्होंने बइख़्तेयार ख़ुद शुक्र अदा किया) या यह के अदाए शुक्र के असबाब तेरे क़बज़ए क़ुदरत में न थे (और उन्होंने ख़ुद असबाबे शुक्र मुहय्या किये) जिस पर तूने उन्हें जज़ा मरहमत फ़रमाई (ऐसा तो नहीं है) बल्के ऐ मेरे माबूद! तू उनके जुमला उमूर का मालिक था, क़ब्ल इसके के वह तेरी इबादत पर क़ादिर व तवाना हों और तूने उनके लिये अज्र व सवाब को मुहय्या कर दिया था क़ब्ल इसके के वह तेरी इताअत में दाखि़ल हों और यह इसलिये के तेरा तरीक़ाए इनआम व इकराम तेरी आदते तफ़ज़्ज़ुल व एहसान और तेरी रौशन अफ़ो व दरगुज़र है। चुनांचे तमाम कायनात उसकी मारेफ़त है के तू जिस पर अज़ाब करे उस पर कोई ज़ुल्म नहीं करता और गवाह है इस बात की के जिसको तू मुआफ़ कर दे उस पर तफ़ज़्ज़ुल व एहसान करता है। और हर षख़्स इक़रार करेगा, अपने नफ्स की कोताही का उस (इताअत) के बजा लाने में जिसका तू मुस्तहेक़ है। अगर शैतान उन्हें तेरी इबादत से न बहकाता तो फिर कोई शख़्स तेरी नाफ़रमानी न करता और अगर बातिल को हक़ के लिबास में उनके सामने पेश न करता तो तेरे रास्ते से कोई गुमराह न होता। पाक है तेरी ज़ात, तेरा लुत्फ़ व करम, फ़रमाबरदार हो या गुनहगार हर एक के मामले में किस क़द्र आशकारा है। यूं के इताअत गुज़ार को उस अमले ख़ैर पर जिस के असबाब तूने ख़ुद फ़राहम किये हैं जज़ा देता है और गुनहगार को फ़ौरी सज़ा देने का इख़्तेयार रखते हुए फिर मोहलत देता है। तूने फ़रमाबरदार व नाफ़रमान दोनों को वह चीज़ेंदी हैं जिनका उन्हें इस्तेहक़ाक़ न था। और इनमें से हर एक पर तूने वह फ़ज़्ल व एहसान किया है जिसके मुक़ाबले में उनका अमल बहुत कम था। और अगर तू इताअत गुज़ार को सिर्फ़ उन आमाल पर जिनका सरो सामान तूने मुहय्या किया है जज़ा देता तो क़रीब था के वह सवाब को अपने हाथ से खो देता और तेरी नेमतें उससे ज़ायल हो जातीं लेकिन तूने अपने जूद व करम से फ़ानी व कोताह मुद्दत के आमाल के एवज़ तूलानी व जावेदानी मुद्दत का अज्र्र व सवाब बख़्शा और क़लील व ज़वाल पज़ीद आमाल के मुक़ाबले में दाएमी व सरी जज़ा मरहमत फ़रमाई, फिर यह के तेरे ख़्वाने नेमत से जो रिज़्क़ खाकर उसने तेरी इताअत पर क़ूवत हासिल की उसका कोई एवज़ तूने नहीं चाहा और जिन आज़ा व जवारेह से काम लेकर तेरी मग़फ़ेरत तक राह पैदा की उसका सख़्ती से कोई मुहासेबा नहीं किया। और अगर तू ऐसा करता तो इसकी तमाम मेहनतों का हासिल और सब कोशिशों का नतीजा तेरी नेमतों और एहसानों में से एक अदना व मामूली क़िस्म की नेमत के मुक़ाबले में ख़त्म हो जाता और बक़िया नेमतों के लिये तेरी बारगाह में गिरवी होकर रह जाता (यानी उसके पास कुछ न होता के अपने को छुड़ाता) तो ऐसी सूरत में वह कहां तेरे किसी सवाब का मुस्तहेक़ हो सकता था? नहीं! वह कब मुस्तहक़ हो सकता था।

ऐ मेरे माबूद! यह तो तेरी इताअत करने वाले का हाल और तेरी इबादत करने वाले की सरगुज़श्त है और वह जिसने तेरे एहकाम की खि़लाफ़वर्ज़ी की और तेरे मुनहेयात का मुरतकिब हुआ उसे भी सज़ा देने में तूने जल्दी नहीं की ताके वह मासियत व नाफ़रमानी की हालत को छोड़कर तेरी इताअत की तरफ़ रूजु हो सके। सच तो यह है के जब पहले पहल उसने तेरी नाफ़रमानी का क़स्द किया था जब ही वह हर उस सज़ा का जिसे तूने तमाम ख़ल्क़ के लिये मुहय्या किया है मुस्तहेक़ हो चुका था तो हर वह अज़ाब जिसे तूने उससे रोक लिया सज़ा व उक़ूबत का हर वह जुमला जो उससे ताख़ीर में डाल दिया, यह तेरा अपने हक़ से चश्मपोशी करना और इस्तेहक़ाक़ से कम पर राज़ी होना है।

ऐ मेरे माबूद! ऐसी हालत में तुझसे बढ़कर कौन करीम हो सकता है और उससे बढ़कर के जो तेरी मर्ज़ी के खि़लाफ़ तबाह व बरबाद हो कौन बदबख़्त हो सकता है? नहीं! कौन है जो उससे ज़्यादा बदबख़्त हो। तू मुबारक है के तेरी तौसीफ़ लुत्फ़ व एहसान ही के साथ हो सकती है। और तू बुलन्दतर है इससे के तुझसे अद्ल व इन्साफ़ के खि़लाफ़ का अन्देशा हो जो शख़्स तेरी नाफ़रमानी करे तुझसे यह अन्देशा हो ही नहीं सकता के तू उस पर ज़ुल्म व जौर करेगा और न उस शख़्स के बारे में जो तेरी रिज़ा व ख़ुशनूदी को मलहूज़ रखे तुझसे हक़तलफ़ी का ख़ौफ़ हो सकता है, तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी आरज़ूओं को बर ला और मेरे लिये हिदायत और रहनुमाई में इतना इज़ाफ़ा फ़रमा के मैं अपने कामों में तौफ़ीक़ से हमकिनार हूँ इसलिये के तू नेमतों का बख़्शने वाला और लुत्फ़ व करम करने वाला है।

 

أللَّهُمَّ إنَّ أَحَداً لاَ يَبْلُغُ مِنْ شُكْرِكَ غَايَةً إلاّ حَصَلَ عَلَيْهِ مِنْ إحْسَانِكَ مَا يُلْزِمُهُ شُكْرَاً، وَلا يَبْلُغُ مَبْلَغاً مِنْ طَاعَتِكَ وَإن اجْتَهَدَ إلاَّ كَانَ مُقَصِّراً دُونَ اسْتِحْقَاقِكَ بِفَضْلِكَ، فَأَشْكَرُ عِبَادِكَ عَاجِزٌ عَنْ شُكْرِكَ وَأَعْبَدُهُمْ مُقَصِّرٌ عَنْ طَاعَتِكَ، وَلا أَنْ تَرْضَى عَنْهُ بِاسْتِيجَابِهِ، فَمَنْ غَفَرْتَ لَهُ فَبِطَولِكَ، وَمَنْ رَضِيْتَ عَنْهُ فَبِفَضْلِكَ تَشْكُرُ يَسِيرَ مَا شُكِرْتَهُ وَتُثِيبُ عَلَى قَلِيلِ مَا تُطَاعُ فِيهِ حَتَّى كَأَنَّ شُكْـرَ عِبَادِكَ الَّذِيْ أَوْجَبْتَ عَلَيْهِ ثَوَابَهُمْ وَأَعْظَمْتَ عَنْهُ جَزَاءَهُمْ أَمْرٌ مَلَكُوا اسْتِطَاعَةَ الامْتِنَاعِ مِنْهُ دُونَكَ فَكَافَيْتَهُمْ أَوْ لَمْ يَكُنْ سَبَبُهُ بِيَدِكَ فَجَازَيْتَهُمْ، بَـلْ مَلَكْتَ يَا إلهِي أَمْرَهُمْ قَبْلَ أَنْ يَمْلِكُوا عِبَادَتَكَ، وَأَعْدَدْتَ ثَوَابَهُمْ قَبْلَ أَنْ يُفِيضُوا فِي طَاعَتِكَ، وَذَلِكَ أَنَّ سُنَّتَكَ الأِفْضَالُ، وَعَادَتَكَ الإحْسَانُ، وَسَبِيلَكَ الْعَفْوُ، فَكُلُّ الْبَرِيِّةِ مًعْتَرِفَةٌ بِأَنَّكَ غَيْرُ ظَالِم لِمَنْ عَاقَبْتَ، وَشَاهِدَةٌ بِأَنَّكَ مُتَفَضِّلٌ عَلَى مَنْ عَافَيْتَ، وَكُلٌّ مُقِرٌّ عَلَى نَفْسِهِ بِالتَّقْصِيْرِ عَمَّا اسْتَوْجَبْتَ، فَلَوْلا أَنَّ الشَّيْطَانَ يَخْتَدِعُهُمْ عَنْ طَاعَتِكَ ما عَصاكَ عاصٍ وَلَوْلا أَنَّهُ صَوَّرَ لَهُمُ البَاطِلَ فِي مِثَالِ الْحَقِّ مَا ضَلَّ عَنْ طَرِيْقِكَ ضَالٌّ. فَسُبْحَانَكَ مَا أَبْيَنَ كَرَمَكَ فِي مُعَامَلَةِ مَنْ أَطَاعَكَ أَوْ عَصَاكَ، تَشْكُرُ للْمُطِيْعِ مَا أَنْتَ تَوَلَّيْتَهُ لَهُ، وَتُمْلِي لِلْعَاصِي فِيْمَا تَمْلِكُ مُعَاجَلَتَهُ فِيْهِ، أَعْطَيْتَ كُلاًّ مِنْهُمَا مَا لَمْ يَجِبْ لَهُ، وَتَفَضَّلْتَ عَلَى كُلٍّ مِنْهُمَا بِمَا يَقْصُرُ عَمَلُهُ عَنْهُ وَلَوْ كَافَأْتَ الْمُطِيعَ عَلَى مَا أَنْتَ تَوَلَّيْتَهُ لاَوْشَكَ أَنْ يَفْقِدَ ثَوَابَكَ، وَأَنْ تَزُولَ عَنْهُ نِعْمَتُكَ وَلكِنَّكَ بِكَرَمِكَ جَازَيْتَهُ عَلَى الْمُدَّةِ الْقَصِيرَةِ الفَانِيَةِ بِالْمُدَّةِ الطَّوِيلَةِ الْخَالِدَةِ، وَعَلَى الْغَايَةِ الْقَرِيبَةِ الزَّائِلَةِ بِالْغايَةِ الْمَدِيدَةِ الْبَاقِيَةِ، ثُمَّ لَمْ تَسُمْهُ الْقِصَاصَ فِيمَا أَكَلَ مِنْ رِزْقِكَ الَّذِي يَقْوَى بِهِ عَلَى طَاعَتِكَ، وَلَـمْ تَحْمِلْهُ عَلَى الْمُنَاقَشَاتِ فِي الآلاتِ الَّتِي تَسَبَّبَ بِاسْتِعْمَالِهَا إلَى مَغْفِـرَتِكَ، وَلَـوْ فَعَلْتَ ذلِكَ بِهِ لَذَهَبَ بِجَمِيْعِ مَا كَدَحَ لَهُ وَجُمْلَةِ مَا سَعَى فِيهِ، جَزَاءً لِلصُّغْرى مِنْ أَيادِيْكَ وَمِنَنِكَ، وَلَبَقِيَ رَهيناً بَيْنَ يَدَيْكَ بِسَائِرِ نِعَمِكَ فَمَتَى كَانَ يَسْتَحِقُّ شَيْئاً مِنْ ثَوَابِكَ ، لا ، مَتَى؟. هَذَا يا إلهِي حَالُ مَنْ أَطَاعَكَ وَسَبِيلُ مَنْ تَعَبَّدَ لَكَ، فَأَمَّا الْعَاصِيْ أَمْرَكَ وَالْمُوَاقِـعُ نَهْيَكَ فَلَمْ تُعَاجِلْهُ بِنَقِمَتِكَ لِكَيْ يَسْتَبْدِلَ بِحَالِهِ فِي مَعْصِيَتِكَ حَالَ الاِنَابَـةِ إلَى طَـاعَتِـكَ، وَلَقَـدْ كَـانَ يَسْتَحِقُّ فِي أَوَّلِ مَـا هَمَّ بِعِصْيَانِكَ كُلَّ مَا أَعْدَدْتَ لِجَمِيعِ خَلْقِكَ مِنْ عُقُوبَتِكَ، فَجَمِيعُ مَا أَخَّرْتَ عَنْهُ مِنْ الْعَذَابِ، وَأَبْطَأتَ بِهِ عَلَيْهِ مِنْ سَطَوَاتِ النَّقِمَةِ وَالْعِقَابِ تَرْكٌ مِنْ حَقِّكَ، وَرِضىً بِدُونِ وَاجِبِكَ، فَمَنْ أكْرَمُ يَا إلهِي مِنْكَ وَمَنْ أَشْقَى مِمَّنْ هَلَكَ عَلَيْـكَ، لا ، مَنْ؟ فَتَبَارَكْتَ أَنْ تُوصَفَ إلاّ بِالإحْسَانِ، وَكَـرُمْتَ أَنْ يُخَافَ مِنْكَ إلاّ الْعَدْلُ، لا   يُخْشَى جَوْرُكَ عَلَى مَنْ عَصَاكَ، وَلاَ يُخَافُ إغْفَالُكَ ثَوَابَ مَنْ أَرْضَاكَ. فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَهَبْ لِيْ أَمَلِي، وَزِدْنِي مِنْ هُدَاكَ مَا أَصِلُ بِهِ إلَى التَّوْفِيقِ فِي عَمَلِي، إنَّكَ مَنَّانٌ كَرِيمٌ.

 

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