सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 26 - जब हमसायों और दोस्तों को याद करते तो यह दुआ फ़रमाते 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी इस सिलसिले में बेहतर नुसरत फ़रमा के मैं अपने हमसायों और उन दोस्तों के हुक़ूक़ का लेहाज़ रखूं जो हमारे हक़ के पहचानने वाले और हमारे दुष्मनों के मुख़ालिफ़ हैं और उन्हें अपने तरीक़ों के क़ाएम करने और उमदा इख़लाक़ व आदाब से आरास्ता होने की तौफ़ीक़ दे इस तरह के वह कमज़ोरों के साथ नरम रवैया रखें और उनके फ़क्ऱ का मदावा करें, मरीज़ों की बीमार पुर्सी, तालिबाने हिदायत की हिदायत, मषविरा करने वालों की ख़ैर ख़्वाही और ताज़ा वारिद से मुलाक़ात करें। राज़ों को छिपाएं, ऐबों पर पर्दा डालें, मज़लूम की नुसरत और घरेलू ज़रूरियात के ज़रिये हुस्ने मवासात करें और बख़्शिश व इनआम से फ़ायदा पहुंचाएं और सवाल से पहले उनके ज़ुरूरियात मुहैया करें। ऐ अल्लाह! मुझे ऐसा बना के मैं उनमें से बुरे के साथ भलाई से पेष आऊं और ज़ालिम से चष्मपोषी करके दरगुज़र करूं और इन सबके बारे में हुस्ने ज़न से काम लूँ और नेकी व एहसान के साथ सबकी ख़बरगीरी करूं और परहेज़गारी व इफ़्फत की बिना पर उन (के उयूब) से आंखें बन्द रखूं। तवाज़ोह व फ़रवतनी की रू से उनसे नरम रवय्या इख़्तेयार करूं और षफ़क़्क़त की बिना पर मुसीबतज़दा की दिलजोई करूं। उनकी ग़ैबत में भी उनकी मोहब्बत को दिल में लिये रहूं और ख़ुलूस की बिना पर उनके पास सदा नेमतों का रहना पसन्द करूं और जो चीज़ें अपने ख़ास क़रीबियों के लिये ज़रूरी समझूं उनके लिये भी ज़रूरी समझूं, और जो मुराहात अपने मख़सूसीन से करूं वोही मुराहात उनसे भी करूं। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे भी उनसे वैसे ही सुलूक का रवादार क़रार दे और जो चीज़ें उनके पास हैं उनमें मेरा हिस्सा वाफ़िर क़रार दे। और उन्हें मेरे हक़ की बसीरत और मेरे फ़ज़्ल व बरतरी की मारेफ़त में अफ़ज़ाइष व तरक़्क़ी दे ताके वह मेरी वजह से सआदतमन्द और मैं उनकी वजह से मसाब व माजूर क़रार पाऊं। आमीन ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

 

أللَّهُمَّ صَـلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِـهِ وَتَـوَلَّنِي فِي جيرَانِي وَمَوَالِيَّ وَالْعَارِفِينَ بحَقِّنَا  وَالْمُنَابِذِينَ لأِعْدَائِنَا بِأَفْضَلِ وَلاَيَتِكَ، وَوَفِّقْهُمْ لإقَامَةِ سُنَّتِكَ وَالأَخْذِ بِمَحَاسِنِ أَدَبِكَ فِي إرْفَاقِ ضَعِيفِهِمْ، وَسَدِّ خَلَّتِهِمْ، وَعِيَادَةِ مَرِيضِهِمْ، وَهِدَايَةِ مُسْتَرْشِدِهِمْ، وَمُنَاصَحَةِ مُسْتَشِيرِهِمْ، وَتَعَهُّدِ قَادِمِهِمْ، وَكِتْمَانِ أَسْرَارِهِمْ،  وَسَتْرِ عَوْرَاتِهِمْ، وَنُصْرَةِ مَظْلُومِهِمْ،  وَحُسْنِ مُوَاسَاتِهِمْ بِالْمَاعُونِ، وَالْعَوْدِ عَلَيْهِمْ بِـالْجِـدَةِ وَالإِفْضَـالِ، وَإعْطَآءِ مَـا يَجِبُ لَهُمْ قَبْلَ السُّؤالِ  و اجْعَلْنِي اللَّهُمَّ أَجْزِي بِالإحْسَانِ مُسِيْئَهُمْ، وَاعْرِضُ بِالتَّجَاوُزِ عَنْ ظَالِمِهِمْ، وَأَسْتَعْمِلْ حُسْنَ الظّنِّ فِي كَافَّتِهِمْ، وَأَتَوَلَّى بِالْبِرِّ عَامَّتَهُمْ، وَأَغُضُّ بَصَرِي عَنْهُمْ عِفَّةً، وَألِينُ جَانِبِيْ لَهُمْ تَوَاضُعاً،وَأَرِقُّ عَلَى أَهْلِ الْبَلاءِ مِنْهُمْ رَحْمَةً، وَأسِرُّ لَهُمْ بِالْغَيْبِ مَوَدَّةً، وَأُحِبُّ بَقَاءَ النِّعْمَةِ عِنْدَهُمْ نُصْحاً، وَاُوجِبُ لَهُمْ مَا اُوجِبُ لِحَامَّتِي، وَأَرْعَى لَهُمْ مَا أَرْعَى لِخَاصَّتِي.أَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمِّد وَآلِهِ ، وَارْزُقْنِي مِثْلَ ذَلِكَ مِنْهُمْ، وَاجْعَلْ لِي أَوْفَى الْحُظُوظِ فِيمَا عِنْدَهُمْ ، وَزِدْهُمْ بَصِيْرَةً فِي حَقِّي، وَمَعْرِفَةً بِفَضْلِي، حَتَّى يَسْعَدُوا بِي وَأَسْعَدَ بِهِمْ آمِينَ رَبَّ الْعَالَمِينَ. 

 

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