सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 24 - वालेदैन के हक़ में दुआ 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ अल्लाह! अपने अब्दे ख़ास और रसूल मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम और उनके पाक व पाकीज़ा अहलेबैत (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उन्हें बेहतरीन रहमत व बरकत और दुरूद व सलाम के साथ ख़ुसूसी इम्तियाज़ बख़्श, और ऐ माबूद! मेरे मँा बाप को भी अपने नज़दीक इज़्ज़त व करामत और अपनी रहमत से मख़सूस फ़रमा। ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। उनके जो हुक़ूक़ मुझ पर वाजिब हैं उनका इल्म बज़रिये इलहाम अता कर और उन तमाम वाजेबात का इल्म बे कम व कास्त मेरे लिये मुहयया फ़रमा दे। फिर जो मुझे बज़रिये इलहाम बताए उस पर कारबन्द रख और इस सिलसिले में जो बसीरत इल्मी अता करे उस पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ दे ताके उन बातों में से जो तूने मुझे तालीम की हैं कोई बात अमल में आए बग़ैर न रह जाए और उस खि़दमतगुज़ारी से जो तूने मुझे बतलाई है, मेरे हाथ पैर थकन महसूस न करें। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके तूने उनकी तरफ़ इन्तेसाब से हमें शरफ़ बख़्शा है। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके तूने उनकी वजह से हमारा हक़ मख़लूक़ात पर क़ायम किया है। ऐ अल्लाह! मुझे ऐसा बना दे के मैं इन दोनों से इस तरह डरूं जिस तरह किसी जाबिर बादषाह से डरा जाता है और इस तरह उनके हाल पर शफ़ीक़ व मेहरबान रहूँ जिस तरह शफ़ीक़ मां (अपनी औलाद पर) शफ़क़्क़त करती है और उनकी फ़रमाबरदारी और उनसे हुस्ने सुलूक के साथ पेश आने को मेरी आंखों के लिये इससे ज़्यादा कैफ़ अफ़ज़ा क़रार दे जितना चश्मे ख़्वाब आलूद में नीन्द का ख़ुमार और मेरे क़ल्ब व रूह के लिये इससे बढ़ कर मसर्रत अंगेज़ क़रार दे जितना प्यासे के लिये जरअए आब। ताके मैं अपनी ख़्वाहिश पर उनकी ख़्वाहिश को तरजीह दूँ और अपनी ख़ुशी पर उनकी ख़ुशी को मुक़द्दम रखूँ और उनके थोड़े एहसान को भी जो मुझ पर करें, ज़्यादा समझूं। और मैं जो नेकी उनके साथ करूं वह ज़्यादा भी हो तो उसे कम तसव्वुर करूं। ऐ अल्लाह! मेरी आवाज़ को उनके सामने आहिस्ता मेरे कलाम को उनके लिये ख़ुशगवार, मेरी तबीयत को नरम और मेरे दिल को मेहरबान बना दे और मुझे उनके साथ नर्मी व शफ़क़्क़त से पेश आने वाला क़रार दे। ऐ अल्लाह! उन्हें मेरी परवरिश की जज़ाए ख़ैर दे और मेरे हुस्ने निगेहदाश्त पर अज्र व सवाब अता कर और कमसिनी में मेरी ख़बरगीरी का उन्हें सिला दे। ऐ अल्लाह! उन्हें मेरी तरफ़ से कोई तकलीफ़ पहुंची हो या मेरी जानिब से कोई नागवार सूरत पेश आई हो या उनकी हक़तलफ़ी हुई हो तो उसे उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा, दरजात की बलन्दी और नेकियों में इज़ाफ़े का सबब क़रार दे। ऐ बुराइयों को कई गुना नेकियों से बदल देने वाले, बारे इलाहा! अगर उन्होंने मेरे साथ गुफ़्तगू में सख़्ती या किसी काम में ज़्यादती या मेरे किसी हक़ में फ़रोगुज़ाश्त या अपने फ़र्ज़े मन्सबी में कोताही की हो तो मैं उनको बख़्शता हूं और उसे नेकी व एहसान का वसीला क़रार देता हूं, और पालने वाले! तुझसे ख़्वाहिश करता हूँ के इसका मोआख़ेज़ा उनसे न करना। इसमें अपनी निस्बत उनसे कोई बदगुमानी नहीं रखता और न तरबीयत के सिलसिले में उन्हें सहल अंगार समझता हूँ और न उनकी देखभाल को नापसन्द करता हूँ इसलिये के उनके हुक़ूक़ मुझपर लाज़िम व वाजिब, उनके एहसानात देरीना और उनके इनआमात अज़ीम हैं। वह इससे बालातर हैं के मैं उनको बराबर का बदला या वैसा ही एवज़ दे सकूँ। अगर ऐसा कर सकूं तो ऐ मेरे माबूद! वह उनका हमहवक़्त मेरी तरबीयत में मशग़ूल रहना, मेरी ख़बरगीरी में रन्ज व ताब उठाना और ख़ुद असरत व तंगी में रहकर मेरी आसूदगी का सामान करना कहाँ जाएगा भला कहां हो सकता है के वह अपने हुक़ूक़ का सिला मुझसे पा सकें और न मैं ख़ुद ही उनके हुक़ूक़ से सुबुकदोश हो सकता हूँ और न उनकी खि़दमत का फ़रीज़ा अन्जाम दे सकता हूँ। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरी मदद फ़रमा ऐ बेहतर उनसे जिनसे मदद मांगी जाती है और मुझे तौफ़ीक़ दे ऐ ज़्यादा रहनुमाई करने वाले उन सबसे जिनकी तरफ़ (हिदायत के लिये) तवज्जो की जाती है। और मुझे उस दिन जबके हर शख़्स को उसके आमाल का बदला दिया जाएगा और किसी पर ज़्यादती न होगी उन लोगों में से क़रार न देना जो माँ-बाप के आक़ व नाफ़रमाबरदार हों। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) व औलाद (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे माँ-बाप को उससे बढ़कर इम्तियाज़ दे जो मोमिन बन्दों के माँ-बाप को तूने बख़्शा है। ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले। ऐ अल्लाह! उनकी याद को नमाज़ों के बाद रात की साअतों और दिन के तमाम लम्हों में किसी वक़्त फ़रामोश न होने दे। ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उनके हक़ में दुआ करने की वजह से और उन्हें मेरे साथ नेकी करने की वजह से लाज़मी तौर पर बख़्श दे और मेरी सिफ़ारिश की वजह से उनसे क़तई तौर पर राज़ी व ख़ुशनूद हो और उन्हें इज़्ज़त व आबरू के साथ सलामती की मन्ज़िलों तक पहुंचा दे। ऐ अल्लाह! अगर तूने उन्हें मुझसे पहले बख़्श दिया तो उन्हें मेरा शफ़ीअ बना। और अगर मुझे पहले बख़्श दिया तो मुझे उनका शफ़ीअ क़रार दे ताके हमस ब तेरे लुत्फ़ व करम की बदौलत तेरे बुज़ुर्गी के घर और बख़्शिश व रहमत की मन्ज़िल में एक साथ जमा हो सकें। यक़ीनन तू बड़े फ़ज़्ल वाला क़दीम एहसान वाला और सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है।

 

أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد عَبْـدِكَ  وَرَسُولِـكَ وَأَهْلِ بَيْتِهِ الطَّاهِرِينَ،  وَاخْصُصْهُمْ بِأَفْضَلِ صَلَوَاتِكَ وَرَحْمَتِكَ وَبَرَكَاتِكَ وَسَلاَمِكَ، وَاخْصُصِ اللَّهُمَّ وَالِدَيَّ بِالْكَرَامَةِ لَدَيْكَ، وَالصَّلاَةِ مِنْكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَأَلْهِمْنِي عِلْمَ مَا يَجبُ لَهُمَا عَلَىَّ إلْهَاماً، وَاجْمَعْ لِي عِلْمَ ذلِكَ كُلِّهِ تَمَامـاً، ثُمَّ اسْتَعْمِلْنِي بِمَا تُلْهِمُنِي مِنْـهُ،  وَوَفِّقْنِي لِلنُّفُوذِ فِيمَا تُبَصِّـرُنِيْ مِنْ عِلْمِهِ، حَتَّى لاَ يَفُوتَنِي اسْتِعْمَالُ شَيْء عَلَّمْتَنِيْهِ، وَلاَ تَثْقُلَ أَرْكَانِي عَنِ الْحُفُوفِ فِيمَا أَلْهَمْتَنِيهِ. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ كَمَا شَرَّفْتَنَا بِهِ وَصَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ  كَمَا أَوْجَبْتَ لَنَا الْحَقَّ عَلَى الْخَلْقِ بِسَبَبِهِ.   أللَّهُمَّ اجْعَلْنِي أَهَابُهُمَا هَيْبَةَ السُّلْطَانِ الْعَسُوفِ،  وَأَبَرُّهُمَا بِرَّ الأُمِّ الرَّؤُوفِ، وَاجْعَلْ طَاعَتِي لِوَالِدَيَّ وَبِرِّيْ بِهِمَا أَقَرَّ لِعَيْنِي مِنْ رَقْدَةِ الْوَسْنَانِ، وَأَثْلَجَ لِصَدْرِي مِنْ شَرْبَةِ الظَّمْآنِ حَتَّى أوثِرَ عَلَى هَوَايَ هَوَاهُمَا وَأُقَدِّمَ عَلَى رِضَاىَ رِضَاهُمَا وَأَسْتَكْثِرَ بِرَّهُمَا بِي وَإنْ قَلَّ وَأَسْتَقِلَّ بِرِّي بِهِمَا وَإنْ كَثُرَ.  أللَّهُمَّ خَفِّضْ لَهُمَا صَوْتِي، وَأَطِبْ لَهُمَا كَلاَمِي،  وَأَلِنْ لَهُمَا عَرِيْكَتِي، وَاعْطِفْ عَلَيْهِمَا قَلْبِي،  وَصَيِّرْنِي بِهِمَا رَفِيقاً، وَعَلَيْهِمَا شَفِيقاً. أللَّهُمَّ اشْكُرْ لَهُمَا تَرْبِيَتِي وَأَثِبْهُمَا عَلَى تَكْرِمَتِي، وَاحْفَظْ لَهُمَا مَا حَفِظَاهُ مِنِّي فِي صِغَرِي.  اللَّهُمَّ وَمَا مَسَّهُمَا مِنِّي مِنْ أَذَىً أَوْ خَلَصَ إلَيْهِمَا عَنِّي مِنْ مَكْرُوه أَوْ ضَاعَ قِبَلِي لَهُمَا مِنْ حَقٍّ فَاجْعَلْهُ حِطَّةً لِذُنُوبِهِمَا وَعُلُوّاً فِي دَرَجَاتِهِمَا وَزِيَادَةً فِي حَسَنَاتِهِمَا يَا مُبَدِّلَ السَّيِّئاتِ بِأَضْعَافِهَا مِنَ الْحَسَنَاتِ. أللَّهُمَّ وَمَا تَعَدَّيَا عَلَيَّ فِيهِ مِنْ قَوْل، أَوْ أَسْرَفَا عَلَىَّ فِيْهِ مِنْ فِعْل، أَوْ ضَيَّعَاهُ لِي مِنْ حَقٍّ أَوْ قَصَّرا بِي عَنْهُ مِنْ وَاجِب فَقَدْ وَهَبْتُهُ وَجُدْتُ بِهِ عَلَيْهِمَا، وَرَغِبْتُ إلَيْكَ فِي وَضْعِ تَبِعَتِهِ عَنْهُمَا  فَإنِّي لا أَتَّهِمُهُمَا عَلَى نَفْسِي، وَلاَ أَسْتَبْطِئُهُمَا فِي بِرِّي، وَلا أكْرَهُ مَا تَوَلَّياهُ مِنْ أَمْرِي يَا رَبِّ فَهُمَا أَوْجَبُ حَقّاً عَلَيَّ، وَأَقْدَمُ إحْسَانـاً إلَيَّ وَأَعْظَمُ مِنَّةً لَـدَيَّ مِنْ أَنْ أقَاصَّهُمَا بِعَدْل، أَوْ أُجَازِيَهُمَا عَلَى مِثْل، أَيْنَ إذاً يَا إلهِيْ طُولُ شُغْلِهِمَا بِتَرْبِيَتِي ؟ وَأَيْنَ شِدَّةُ تَعَبِهِمَا فِي حِرَاسَتِيْ ؟ وَأَيْنَ إقْتَارُهُمَا عَلَى أَنْفُسِهِمَا لِلتَّوْسِعَةِ عَلَيَّ؟ هَيْهَاتَ مَا يَسْتَوْفِيَانِ مِنِّي حَقَّهُمَا، وَلاَ اُدْرِكُ مَا يَجِبُ عَلَيَّ لَهُمَا وَلا أَنَا بِقَاض وَظِيفَةَ خِدْمَتِهِمَا. فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَأَعِنِّي يَا خَيْرَ مَنِ اسْتُعِينَ بِهِ.  وَوَفِّقْنِي يَا أَهْدَى مَنْ رُغِبَ إلَيْهِ، وَلاَ تَجْعَلْنِي فِي أَهْلِ الْعُقُوقِ لِلآباء ِوَالأُمَّهاتِ يَوْمَ تُجْزى كُلُّ نَفْس بِمَا كَسَبَتْ وَهُمْ لاَيُظْلَمُونَ. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِـهِ وَذُرِّيَّتِهِ،  وَاخْصُصْ أَبَوَيَّ بِأَفْضَلِ مَا خَصَصْتَ بِهِ آبَاءَ عِبَادِكَ الْمُؤْمِنِينَ وَاُمَّهَاتِهِمْ يَا أَرْحَمَ الـرَّاحِمِينَ.  أللَّهُمَّ لاَ تُنْسِنِي ذِكْرَهُمَا فِي أَدْبَارِ صَلَوَاتِي وَفِي أَناً مِنْ آناءِ لَيْلِي، وَفِي كُلِّ سَاعَة مِنْ سَاعَاتِ نَهَارِي. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ  وَاغْفِرْ لِي بِدُعَائِي لَهُمَا، وَاغْفِرْ لَهُمَـا بِبِرِّهِمَـا بِي، مَغْفِرَةً حَتْمـاً وَارْضَ عَنْهُمَا بِشَفَاعَتِي لَهُمَا رِضَىً عَزْماً، وَبَلِّغْهُمَا بِالْكَرَامَةِ مَوَاطِنَ السَّلاَمَةِ. أللَّهُمَّ وَإنْ سَبَقَتْ مَغْفِرَتُكَ لَهُمَا فَشَفِّعْهُمَا فِيَّ، وَإنْ سَبَقَتْ مَغْفِرَتُـكَ لِي فَشَفِّعْنِي فِيْهِمَا، حَتّى نَجْتَمِعَ بِرَأفَتِكَ فِي دَارِ كَرَامَتِكَ وَمَحَلِّ مَغْفِرَتِكَ وَرَحْمَتِكَ، إنَّكَ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ وَالْمَنِّ الْقَدِيْمِ وَأَنْتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ . 

 

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