सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 21 - जब किसी बात से ग़मगीन या गुनाहों की वजह से परेषान होते तो यह दुआ पढ़ते

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ अल्लाह! ऐ यक व तन्हा और कमज़ोर व नातवान की किफ़ायत करने वाले और ख़तरनाक मरहलों से बचा ले जाने वाले! गुनाहों ने मुझे  बे यार व मददगार छोड़ दिया है। अब कोई साथी नहीं है और तेरे ग़ज़ब के बरदाष्त करने से आजिज़ हूँ अब कोई सहारा देने वाला नहीं है। तेरी तरफ़ बाज़गष्त का ख़तरा दरपेष है। अब इस दहषत से कोई तस्कीन देने वाला नहीं है। और जबके तूने मुझे ख़ौफ़ज़दा किया है तो कौन है जो मुझे तुझसे मुतमईन करे और जबके तूने मुझे तन्हा छोड़ दिया है तो कौन है जो मेरी दस्तगीरी करे, और जबके तूने मुझे नातवां कर दिया है तो कौन है जो मुझे क़ूवत दे। ऐ मेरे माबूद! परवरदा को कोई पनाह नहीं दे सकता सिवाए उसके परवरदिगार के और षिकस्त ख़ोरदा को कोई अमान नहीं दे सकता सिवाए उस पर ग़लबा पाने वाले के। और तलबकरदा की कोई मदद नहीं कर सकता सिवाए उसके तालिब के। यह तमाम वसाएल ऐ मेरे माबूद तेरे ही हाथ में हैं और तेरी ही तरफ़ राहे फ़रार व गुरेज़ है। लेहाज़ा तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे गुरेज़ को अपने दामन में पनाह दे और मेरी हाजत बर ला। ऐ अल्लाह! अगर तूने अपना पाकीज़ा रूख़ मुझसे मोड़ लिया और अपने एहसाने अज़ीम से दरीग़ किया या अपने रिज़्क़ को बन्द कर दिया, या अपने रिष्तए रहमत को मुझसे क़ता कर लिया तो मैं अपनी आरज़ूओं तक पहुंचने का वसीला तेरे सिवा कोई पा नहीं सकता और तेरे हाँ की चीज़ों पर तेरी मदद के सिवा दस्तेरस हासिल नहीं कर सकता। क्योंके मैं तेरा बन्दा और तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में हूँ और तेरे ही हाथ में मेरी बागडोर है। तेरे हुक्म के आगे मेरा हुक्म नहीं चल सकता, मेरे मेरे बारे में तेरा फ़रमान जारी और मेरे हक़ में तेरा फ़ैसला अद्ल व इन्साफ पर मबनी है। तेरे क़लम व सलतनत से निकल जाने का मुझे यारा नहीं और तेरे अहाताए क़ुदरत से क़दम बाहर रखने की ताक़त नहीं और न तेरी मोहब्बत को हासिल कर सकता हूं। न तेरी रज़ामन्दी तक पहुंच सकता हूं और न तेरे हां की नेमतें पा सकता हूँ मगर तेरी इताअत और तेरी रहमते ज़ाववाल के वसीले से। ऐ अल्लाह! मैं हर हाल में तेरा ज़लील बन्दा हूं, तेरी मदद के बग़ैर मैं अपने सूद व ज़ेयाँ का मालिक नहीं। मैं इस अज्ज़ व बेबज़ाअती की अपने बारे में गवाही देता हूँ और अपनी कमज़ोरी व बेचारगी का एतराफ़ करता हूँ। लेहाज़ा जो वादा तूने मुझसे किया है उसे पूरा कर और जो दिया है उसे तकमील तक पहुंचा दे इसलिये के मैं तेरा वह बन्दा हूं जो बेनवा, आजिज़, कमज़ोर, बे सरोसामान, हक़ीर, ज़लील, नादार, ख़ौफ़ज़दा और पनाह का ख़्वास्तगार है। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मुझे उन अतियों में जो तूने बख़्षे हैं फ़रामोष कार और उन नेमतों में जो तूने अता की हैं एहसान नाषिनास न बना दे और मुझे दुआ की क़ुबूलियत से ना उम्मीद न कर अगरचे उसमें ताख़ीर हो जाए। आसाइष में हूं या तकलीफ़ में तंगी में हूं या फ़ारिग़ुलबाली में तन्दरूस्ती की हालत में हूँ या बीमारी की। बदहाली में हूँ या ख़ुषहाली में, तवंगरी में हूं या उसरत में। फ़क्ऱ में हूं या दौलतमन्दी में। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे हर हालत में मदह व सताइष व सपास में मसरूफ़ रख यहां तक के दुनिया में से जो कुछ तू दे उस पर ख़ुष न होने लगूँ और जो रोक ले उस पर रन्जीदा न हों। और परहेज़गारी को मेरे दिल का षुआर बना और मेरे जिस्म से वही काम ले जिसे तू क़ुबूल फ़रमा और अपनी इताअत में इन्हेमाक के ज़रिये तमाम दुनियवी इलाएक़ से फ़ारिग़ कर दे ताके उस चीज़ को जो तेरी नाराज़ी का सबब है दोस्त न रखूं और जो चीज़ तेरी ख़ुषनूदी का बाएस है उसे नापसन्द न करूं। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और ज़िन्दगी भर मेरे दिल को अपनी मोहब्बत के लिये फ़ारिग़ कर दे। अपनी याद में उसे मषग़ूल रख। अपने ख़ौफ़ व हेरास के ज़रिये (गुनाहों की) तलाफ़ी का मौक़ा दे, अपपनी तरफ़ रूजू होने से उसको क़ूवत व तवानाई बख़्ष। अपनी इताअत की तरफ़ से माएल और अपने पसन्दीदातरीन रास्ते पर चला और अपनी नेमतों की तलब पर उसे तैयार कर आौर परहेज़गारी को मेरा तोषह, अपनी रहमत की जानिब मेरा सफ़र अपनी ख़ुषनूदी में मेरा गुज़र और अपनी जन्नत में मेरी मन्ज़िल क़रार दे और मुझे ऐसी क़ूवत अता फ़रमा जिससे तेरी रज़ामन्दियों का बोझ उठाऊं और मेरे गुरेज़ को अपनी जानिब और मेरी ख़्वाहिष को अपने हाँ की नेमतों की तरफ़ क़रार दे और बुरे लोगों से मेरे दिल को मतोहिष और अपने और अपने दोस्तों और फ़रमाबरदारों से मानूस कर दे और किसी बदकार और काफ़िर का मुझ पर एहसान न हो। न इसकी निगाहे करम मुझ पर हो और न उसकी मुझे कोई एहतियाज हो बल्कि मेरे दिली सुकून, क़ल्बी लगाव और मेरी बे नियाज़ी व कारगुज़ारी को अपने और अपने बरगुज़ीदा बन्दों से वाबस्ता कर। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उनका हमनषीन व मददगार क़रार दे और अपने षौक़ व वारफ़्तगी और उन आमाल के ज़रिये जिन्हें तू पसन्द करता और जिनसे ख़ुष होता है। मुझ पर एहसान फ़रमा इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ादिर है और यह काम तेरे लिये आसान है। 

 

أَللَّهُمَّ يَا كَافِيَ الْفَرْدِ الضَعِيْفِ، وَوَاقِيَ الامْرِ الْمَخُوْفِ، أَفْرَدَتْنِي الْخَـطَايَا; فَـلاَ صَاحِبَ مَعِي وَضَعُفْتُ عَنْ غَضَبِكَ; فَلاَ مُؤَيِّدَ لِي، وَأَشْرَفْتُ عَلَى خَوْفِ لِقَائِكَ; فَلاَ مُسَكِّنَ لِرَوْعَتِي، وَمَنْ يُؤْمِنُنِي مِنْكَ وَأَنْتَ أَخَفْتَنِي؟ وَمَن يساعِدُنِي وَأَنْتَ أَفْرَدْتَنِي؟ وَمَنْ يُقَوِّيْنِي وَأَنْتَ أَضْعَفْتَنِي؟ لاَ يُجيرُ يا إلهي إلاّ رَبٌّ عَلَى مَرْبُوب، وَلاَ يُؤْمِنُ إلاّ غالِبٌ عَلَى مَغْلُوب، وَلاَ يُعِينُ إِلاّ طالِبٌ عَلَى مَطْلُوب، وَبِيَـدِكَ يَـاَ إلهِي جَمِيعُ ذلِكَ السَّبَبِ، وَإلَيْكَ الْمَفَرُّ وَالْمَهْربُ. فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَأَجِرْ هَرَبِي وَأَنْجِحْ مَطْلَبِي. أللَّهُمَّ إنَّكَ إنْ صَرَفْتَ عَنِّي وَجْهَكَ الْكَرِيْمَ، أَوْ مَنَعْتَنِي فَضْلَكَ الْجَسِيمَ، أَوْ حَظَرْتَ عَلَيَّ رِزْقَكَ أَوْ قَطَعْتَ عَنِّي سَبَبَـكَ لَمْ أَجِدِ السَّبِيـلَ إلَى شَيْء مِنْ أَمَلِي غَيْرَكَ، وَلَمْ أَقْدِرْ عَلَى مَا عِنْدَكَ بِمَعُونَةِ سِوَاكَ; فَإنِّي عَبْدُكَ، وَفِي قَبْضَتِكَ نَاصِيَتِي بِيَدِكَ، لاَ أَمْرَ لِي مَعَ أَمْرِكَ، مَاض فِيَّ حُكْمُكَ، عَدْلٌ فِيَّ قَضَاؤُكَ، وَلاَ قُوَّةَ لِي عَلَى الْخُـرُوجِ مِنْ سُلْطَانِـكَ، وَلاَ أَسْتَطِيـعُ مُجَاوَزَةَ قُدْرَتِكَ، وَلاَ أَسْتَـمِيلُ هَوَاكَ، وَلاَ أبْلُغُ رِضَاكَ، وَلاَ أَنَالُ مَا عِنْدَكَ إلاَّ بِطَاعَتِكَ وَبِفَضْل رَحْمَتِكَ. إلهِي أَصْبَحْتُ وَأَمْسَيْتُ عَبْداً دَاخِراً لَكَ، لا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعاً وَلاَ ضَرّاً إلاَّ بِكَ أَشْهَدُ بِذَلِكَ عَلَى نَفْسِي وَأَعْتَـرِفُ بِضَعْفِ قُـوَّتِي وَقِلَّةِ حِيْلَتِي فَأَنْجزْ لِي مَا وَعَدْتَنِي، وَتَمِّمْ لِي مَا آتَيْتَنِي; فَإنِّي عَبْـدُكَ الْمِسْكِينُ الْمُسْتكِينُ الضَّعِيفُ الضَّـرِيـرُ الذَّلِيلُ الْحَقِيرُ الْمَهِينُ الْفَقِيرُ الْخَائِفُ الْمُسْتَجِيرُ. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَلاَ تَجْعَلْنِي نَاسِيَاً لِذِكْرِكَ فِيمَا أَوْلَيْتَنِي، وَلاَ غافِلاً لإحْسَانِكَ فِيمَا أَبْلَيْتَنِي، وَلا آيسَاً مِنْ إجَابَتِكَ لِي وَإنْ أَبْطَأتَ عَنِّي فِي سَرَّاءَ كُنْتُ أَوْ ضَرَّاءَ، أَوْ شِدَّة أَوْ رَخَاء، أَوْ عَافِيَة أَوْ بَلاء، أَوْ بُؤْس أَوْ نَعْمَاءَ، أَوْ جِدَة أَوْ لأوَاءَ، أَوْ فَقْر أَوْ غِنىً. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَاجْعَلْ ثَنائِي عَلَيْكَ وَمَدْحِي إيَّاكَ وَحَمْدِي لَكَ فِي كُلِّ حَالاَتِي حَتَّى لاَ أَفْرَحَ بِمَا آتَيْتَنِي مِنَ الدُّنْيَا، وَلاَ أَحْـزَنَ عَلَى مَا مَنَعْتَنِي فِيهَا، وَأَشْعِرْ قَلْبِي تَقْوَاكَ، وَاسْتَعْمِلْ بَدَنِي فِيْمَا تَقْبَلُهُ مِنِّي، وَاشْغَلْ بِطَاعَتِكَ نَفْسِي عَنْ كُلِّ مَايَرِدُ عَلَىَّ حَتَّى لاَ اُحِبَّ شَيْئَاً مِنْ سُخْطِكَ، وَلا أَسْخَطَ شَيْئـاً مِنْ رِضَـاكَ. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَفَرِّغْ قَلْبِي لِمَحَبَّتِكَ ، وَاشْغَلْهُ بِذِكْرِكَ، وَانْعَشْهُ بِخَوْفِكَ ، وَبِالْوَجَلِ مِنْكَ، وَقَوِّهِ بِالرَّغْبَةِ إلَيْكَ، وَأَمِلْهُ إلَى طَاعَتِكَ، وَأَجْرِ بِهِ فِي أَحَبِّ السُّبُلِ إلَيْكَ، وَذَلِّلْهُ بِالرَّغْبَةِ فِيمَا عِنْدَكَ أَيَّامَ حَيَاتِي كُلِّهَا، وَاجْعَلْ تَقْوَاكَ مِنَ الدُّنْيَا زَادِي، وَإلَى رَحْمَتِكَ رِحْلَتِي، وَفِي مَرْضَاتِكَ مَدْخَلِي. وَاجْعَلْ فِي جَنَّتِكَ مَثْوَايَ، وَهَبْ لِي قُوَّةً أَحْتَمِلُ بِهَا جَمِيعَ مَرْضَاتِكَ، وَاجْعَلْ فِرَارِي إلَيْكَ، وَرَغْبَتِي فِيمَا عِنْدَكَ، وَأَلْبِسْ قَلْبِي الْوَحْشَةَ مِنْ شِرارِ خَلْقِكَ. وَهَبْ لِي الأُنْسَ بِكَ وَبِأَوْلِيَـآئِكَ وَأَهْلِ طَاعَتِكَ، وَلاَ تَجْعَلْ لِـفَاجِـر وَلا كَافِر عَلَيَّ مِنَّةً، وَلاَ لَـهُ عِنْدِي يَداً، وَلا بِي إلَيْهِمْ حَاجَةً، بَل اجْعَـلْ سُكُـونَ قَلْبِي وَاُنْسَ نَفْسِي وَاسْتِغْنَـائِي وَكِفَايَتِي بِكَ وَبِخِيَـارِ خَلْقِكَ. أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ، وَاجْعَلْنِي لَهُمْ قَـرِيناً، وَاجْعَلْنِي لَهُمْ نَصِيْراً، وَامْنُنْ عَلَيَّ بِشَوْق إلَيْكَ، وَبِالْعَمَلِ لَكَ بِمَا تُحِبُّ وَتَرْضَى إنَّكَ عَلَى كُلِّ شَيْء قَدِيرٌ، وَذَلِكَ عَلَيْكَ يَسِيرٌ .

 

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