सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 20 - पाकीज़ा और अज़ीम अख़लाक़ की खूबियों पाने की दुआ - दुआ मकारिम उल अख़लाक़ (रमज़ान की ख़ास दुआ)

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे ईमान को कामिल तरीन ईमान की हद तक पहुंचा दे और मेरे यक़ीन को बेहतरीन यक़ीन क़रार दे और मेरी नीयत को पसन्दीदातरीन नीयत और मेरे आमाल को बेहतरीन आमाल के पाया तक बलन्द कर दे। ख़ुदावन्द! अपने लुत्फ़ से मेरी नीयत को ख़ालिस व बेरिया और अपनी रहमत से मेरे यक़ीन को इस्तवार और अपनी क़ुदरत से मेरी ख़राबियों की इस्लाह कर दे।

बारे इलाहा। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन मसरूफ़ीन से जो इबादत में मानेअ हैं बेनियाज़ कर दे और उन्हीं चीज़़ों पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ दे जिनके बारे में मुझसे कल के दिन सवाल करेगा और मेरे अय्यामे ज़िन्दगी को ग़रज़े खि़लक़त की अन्जामदेही के लिये मख़सूस कर दे और मुझे (दूसरों से) बेनियाज़ कर दे और मेरे रिज़्क़ में कषाइष व वुसअत फ़रमा। एहतियाज व दस्तंगरी में मुब्तिला न कर। इज़्ज़त व तौक़ीर दे, किब्र व ग़ुरूर से दो चार न होने दे। मेरे नफ़्स को बन्दगी व इबादत के लिये राम कर और ख़ुदपसन्दी से मेरी इबादत को फ़ासिद न होने दे और मेरे हाथों से लोगों को फ़ैज़ पहुंचा दे और उसे एहसान जताने से राएगाना न होने दे। मुझे बलन्दपाया एख़लाक़ मरहमत फ़रमा और ग़ुरूर और तफ़ाख़ुर से महफ़ूज़ रख।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और लोगों में मेरा दरजा जितना बलन्द करे उतना ही मुझे ख़ुद अपनी नज़रों में पस्त कर दे और जितनी ज़ाहेरी इज़्ज़त मुझे दे उतना ही मेरे नफ़्स में बातिनी बेवक़अती का एहसास पैदा कर दे।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसी नेक हिदायत से बहरामन्द फ़रमा के जिसे दूसरी चीज़ से तबदील न करू और ऐसे सही रास्ते पर लगा जिससे कभी मुंह न मोड़ूं, और ऐसी पुख़्ता नीयत दे जिसमें ज़रा षुबह न करूं और जब तक मेरी ज़िन्दगी तेरी इताअत व फ़रमाबरदारी के काम आये मुझे ज़िन्दा रख और जब वह षैतान की चरागाह बन जाए तो इससे पहले के तेरी नाराज़गी से साबक़ा पड़े या तेरा ग़ज़ब मुझ पर यक़ीनी हो जाए, मुझे अपनी तरफ़ उठा ले, ऐ माबूद! कोई ऐसी ख़सलत जो मेरे लिये मोईब समझी जाती हो उसकी इस्लाह किये बग़़ैर न छोड़ और कोई ऐसी बुरी आदत जिस पर मेरी सरज़न्ष की जा सके उसे दुरूस्त किये बग़ैर न रहने दे और जो पाकीज़ा ख़सलत अभी मुझमें नातमाम हो उसे तकमील तक पहुंचा दे।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरी निसबत कीनातोज़ दुष्मनों की दुष्मनी को उलफ़त से, सरकषों के हसद को मोहब्बत से, नेकियों से बेएतमादी को एतमाद से, क़रीबों की अदावत को दोस्ती से, अज़ीज़ों की क़तअ ताल्लुक़ी को सिलए रहमी से, क़राबतदारों की बेएतनाई को नुसरत व तआवुन से, ख़ुषामदियों की ज़ाहेरी मोहब्बत को सच्ची मोहब्बत से और साथियों के एहानत आमेज़ बरताव को हुस्ने मआषेरत से और ज़ालिमों के ख़ौफ़ की तल्ख़ी को अमन की षीरीनी से बदल दे।

ख़ुदावन्दा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और जो मुझ पर ज़ुल्म करे उस पर मुझे ग़लबा दे, जो मुझसे झगड़ा करे उसके मुक़ाबले में ज़बान (हुज्जत षिकन) दे, जो मुझ से दुष्मनी करे उस पर मुझे फ़तेह व कामरानी बख़्ष। जो मुझसे मक्र करे उसके मक्र का तोड़ अता कर, जो मुझे दबाए उस पर क़ाबू दे। जो मेरी बदगोई करे उसे झुटलाने की ताक़त दे और जो डराए धमकाए, उससे मुझे महफ़ूज़ रख। जो मेरी इस्लह करे उसकी इताअत और जो राहे रास्त दिखाए उसकी पैरवी की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उस अम्र की तौफ़ीक़ दे के जो मुझसे ग़ष व फ़रेब करे मैं उसकी ख़ैरख़्वाही करूं, जो मुझे छोड़ दे उससे हुस्ने सुलूक से पेष आऊं, जो मुझे महरूम करे उसे अता व बख़्षिष के साथ एवज़ दूँ और जो क़तए रहमी करे उसे सिलए रहमी के साथ बदला दूँ और जो पसे पुश्त मेरी बुराई करे मैं उसके बरखि़लाफ़ उसका ज़िक्रे ख़ैर करूं और हुस्ने सुलूक पर षुक्रिया बजा लाऊं और बदी से चष्मपोषी करूं।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अद्ल के नश्र, ग़ुस्से के ज़ब्त और फ़ितने के फ़रो करने, मुतफ़र्रिक़ व परागान्दा लोगों को मिलाने, आपस में सुलह व सफ़ाई कराने, नेकी के ज़ाहिर करने, ऐब पर पर्दा डालने, नर्म जोई व फ़रवतनी और हुस्ने सीरत के इख़्तेयार करने, रख रखाव रखने हुस्ने एख़लाक़ से पेष आने, फ़ज़ीलत की तरफ़ पेषक़दमी करने, तफ़ज़्ज़ल व एहसान को तरजीह देने, ख़ोरदागीरी से किनारा करने और मुस्तहक़ के साथ हुस्ने सुलूक के तर्क करने और हक़ बात के कहने में अगरचे वह गराँ गुज़रे, और अपनी गुफ़्तार व किरदार की भलाई को कम समझने में अगरचे वह ज़्यादा हो और अपनी क़ौल और अमल की बुराई को ज़्यादा समझने में अगरचे वह कम हो। मुझे नेकोकारों के ज़ेवर और परहेज़गारों की सज व धज से आरास्ता कर और उन तमाम चीज़ों को दाएमी इताअत और जमाअत से वाबस्तगी और अहले बिदअत और ईजाद करदा राइयों पर अमल करने वालों से अलाहेदगी के ज़रिये पायाए तकमील तक पहुंचा दे।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब मैं बूढ़ा हो तो अपनी वसीअ रोज़ी मेरे लिये क़रार दे और जब आजिज़ व दरमान्दा हो जाऊं तो अपनी क़वी ताक़त से मुझे सहारा दे और मुझे इस बात में मुब्तिला न कर के तेरी इबादत में सुस्ती व कोताही करूं तेरी राह की तषख़ीस में भटक जाऊं, तेरी मोहब्बत के तक़ाज़ों की खि़लाफ़वर्ज़ी करूं और जो तुझसे मुतफ़र्रिक़ व परागान्दा हों उनसे मेलजोल रखूं और जो तेरी जानिब बढ़ने वाले हैं उनसे अलाहीदा रहूं।

ख़ुदावन्द! मुझे ऐसा क़रार दे के ज़रूरत के वक़्त तेरे ज़रिये हमला करूं, हाजत के वक़्त तुझसे सवाल करूं और फ़क्ऱ व एहतियाज के मौक़े पर तेरे सामने गिड़गिड़ाऊं और इस तरह मुझे न आज़माना के इज़तेरार में तेरे ग़ैर से मदद मांगूं और फ़क्ऱ व नादारी के वक़्त तेरे ग़ैर के आगे आजिज़ाना दरख़्वास्त करूं और ख़ौफ़ के मौक़े पर तेरे सिवा किसी दूसरे के सामने गिड़गिड़ाऊं के तेरी तरफ़ से महरूमी, नाकामी और बे एतनाई का मुस्तहक़ क़रार पाऊं। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

ख़ुदाया! जो हिरस, बदगुमानी और हसद के जज़्बात षैतान मेरे दिल में पैदा करे उन्हें अपनी अज़मत की याद अपनी क़ुदरत में तफ़क्कुर और दुष्मन के मुक़ाबले में तदबीर व चारासाज़ी के तसव्वुरात से बदल दे और फ़हष कलामी या बेहूदा गोई, या दुषनाम तराज़ी या झूटी गवाही या ग़ाएब मोमिन की ग़ीबत या मौजूद से बदज़बानी और उस क़बील की जो बातें मेरी ज़बान पर लाना चाहे उन्हें अपनी हम्द सराई मदह में कोषिष व इन्हेमाक, तमजीद व बुज़ुर्गी के बयान, षुक्रे नेमत व एतराफ़े एहसान और अपनी नेमतों के षुमार से तबदील कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझ पर ज़ुल्म न होने पाए जबके तू उसके दफ़ा करने पर क़ादिर है, और किसी पर ज़ुल्म न करूं जबके तू मुझे ज़ुल्म से रोक देने की ताक़त रखता है और गुमराह न हो जाऊं जब के मेरी राहनुमाई तेरे लिये आसान है और मोहताज न हूँ  जबके मेरी फ़ारिग़ुल बाली तेरी तरफ़ से है। और सरकष न हो जाऊ ँ जबके मेरी ख़ुषहाली तेरी जानिब से है।

बारे इलाहा! मैं तेरी मग़फ़ेरत की जानिब आया हूं और तेरी मुआफ़ी का तलबगार और तेरी बख़्षिष का मुष्ताक़ हूं। मैं सिर्फ़ तेरे फ़ज़्ल पर भरोसा रखता हूं और मेरे पास कोई चीज़ ऐसी नहीं है जो मेरे लिये मग़फ़ेरत का बाएस बन सके और न मेरे अमल में कुछ है के तेरे अफ़ो का सज़वार क़रार पाऊं और अब इसके बाद के मैं ख़ुद ही अपने खि़लाफ़ फ़ैसला कर चुका हूं तेरे फ़ज़्ल के सिवा मेरा सरमायाए उम्मीद क्या हो सकता है। लेहाज़ा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल कर और मुझ पर तफ़ज़्ज़ुल फ़रमा, ख़ुदाया मुझे हिदायत के साथ गोया कर, मेरे दिल में तक़वा व परहेज़गारी का अलक़ा फ़रमा, पाकीज़ा अमल की तौफ़ीक़ दे, पसन्दीदा काम में मषग़ूल रख। ख़ुदाया मुझे बेहतरीन रास्ते पर चला और ऐसा कर के तेरे दीन व आईन पर मरूं और उसी पर ज़िन्दा रहूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे (गुफ़तार व किरदार में) मयानारवी से बहरामन्द फ़रमा और दुरूस्तकारों और हिदायत के रहनुमाओं और नेक बन्दों में से क़रार दे और आख़ेरत की कामयाबी और जहन्नम से सलामती अता कर ख़ुदाया मेरे नफ़्स का एक हिस्सा अपनी (इबतेलाओ आज़माइष के) लिये मख़सूस कर दे ताके उसे (अज़ाब से) रेहाई दिला सके और एक हिस्सा के जिससे उसकी (दुनयवी) इस्लाह व दुरूस्ती वाबस्ता है, मेरे लिये रहने दे क्योंके मेरा नफ़्स तो हलाक होने वाला है मगर यह के तू उसे बचा ले जाए।

ऐ अल्लाह! अगर मैं ग़मगीन हूं तो मेरा साज़ व सामाने (तसकीन) तू है, और अगर (हर जगह से) महरूम रहूं तो मेरी उम्मीदगाह तू है, और अगर मुझ पर ग़मों का हुजूम हो तो तुझ ही से दादफ़रयाद है। जो चीज़ जा चुकी, उसका एवज़ और जो षै तबाह हो गई उसकी दुरूस्ती और जो तू नापसन्द करे उसकी तबदीली तेरे हाथ में है। लेहाज़ा बला के नाज़िल होने से पहले आफ़ियत, मांगने से पहले ख़ुषहाली और गुमराही से पहले हिदायत से मुझ पर एहसान फ़रमा और लोगों की सख़्त व दुरषत बातों के रंज से महफ़ूज़ रख और क़यामत के दिन अम्न व इतमीनान अता फ़रमा और हुस्ने हिदायत व इरषाद की तौफ़ीक़ मरहमत फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने लुत्फ़ से (बुराइयों को) मुझसे दूर कर दे और अपनी नेमत से मेरी परवरिष और अपने करम से मेरी इस्लाह फ़रमा और अपने फ़ज़्ल व एहसान से (जिस्मानी व नफ़्सानी अमराज़ से) मेरा मदावा कर। मुझे अपनी रहमत के साये में जगह दे, और अपनी रज़ामन्दी में ढांप ले और जब उमूर मुष्तबा हो जाएं तो जो उनमें ज़्यादा क़रीने सवाब हो और जब आमाल में इष्तेबाह वाक़ेअ हो जाए तो जो उनमें पाकीज़ातर हो और जब जब मज़ाहिब में इख़्तेलाफ़ पड़ जाए तो जो उनमें पसन्दीदातर हो उस पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे बेनियाज़ी का ताज पहना और मुतअल्लुक़ा कामों और अहसन तरीक़ से अन्जाम देने पर मामूर फ़रमा और ऐसी हिदायत से सरफ़राज़ फ़रमा जो दवाम व साबित लिये हुए हो और ग़ना व ख़ुषहाली से मुझे बेराह न होने दे और आसूदगी व आसाइष अता फ़रमा, और ज़िन्दगी को सख़्त दुष्वार न बना दे।  मेरी दुआ को रद्द न कर क्योंके मैं किसी को तेरा मद्दे मुक़ाबिल नहीं क़रार देता और न तेरे साथ किसी को तेरा हमसर समझते हुए पुकारता हूँ।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे फ़ुज़ूलख़र्ची से बाज़ रख और मेरी रोज़ी को तबाह होने से बचा और मेरे माल में बरकत देकर इसमें इज़ाफ़ा कर और मुझे इसमें से उमूरे ख़ैर में ख़र्च करने की वजह से राहे हक़ व सवाब तक पहुंचा।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे कस्बे माषियत के रंज व ग़म से बेनियाज़ कर दे और बेहिसाब रोज़ी अता फ़रमा ताके तलाषे मआष में उलझ कर तेरी इबादत से रूगर्दान न हो जाऊं और (ग़लत व नामषरूअ) कार व कस्ब का ख़मयाज़ा न भुगतूं।

ऐ अल्लाह! मैं जो कुछ तलब करता हूं उसे अपनी क़ुदरत से मुहय्या कर दे और जिस चीज़ से ख़ाएफ़ हूं उससे अपनी इज़्ज़त व जलाल के ज़रिये पनाह दे।

ख़ुदाया! मेरी आबरू को ग़ना व तवंगरी के साथ महफ़ूज़ रख और फ़क्ऱ व तंगदस्ती से मेरी मन्ज़ेलत को नज़रों से न गिरा के तुझसे रिज़्क़ पाने वालों से रिज़्क़ मांगने लगूं और तेरे पस्त बन्दों की निगाहे लुत्फ़ व करम को अपनी तरफ़ मोड़ने की तमन्ना करूं और जो मुझे दे उसकी मदह व सना और जो न दे उसकी बुराई करने में मुब्तिला हो जाऊं। और तू ही अता करने और रोक लेने का इख़्तेयार रखता है न के वह।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसी सेहत दे जो इबादत में काम आए और ऐसी फ़ुरसत जो दुनिया से बेताअल्लुक़ी में सर्फ़ हो और ऐसा इल्म जो अमल के साथ हो और ऐसी परहेज़गारी जो हद्दे एतदाल में हो (के वसवास में मुब्तिला न हो जाऊं)

ऐ अल्लाह! मेरी मुद्दते हयात को अपने अफ़ो व दरगुज़र के साथ ख़त्म कर और मेरी आरज़ू को रहमत की उम्मीद में कामयाब फ़रमा और अपनी ख़ुषनूदी तक पहुंचने के लिये राह आसान कर और हर हालत में मेरे अमल को बेहतर क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ग़फ़लत के लम्हात में अपने ज़िक्र   के लिये होषियार कर और मोहलत के दिनों में अपनी इताअत में मसरूफ़ रख और अपनी मोहब्बत की सहल व आसान राह मेरे लिये खोल दे और उसके ज़रिये मेरे लिये दुनिया व आख़ेरत की भलाई को कामिल कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी औलाद पर बेहतरीन रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जो उससे पहले तूने मख़लूक़ात में से किसी एक पर नाज़िल की हो और उसके बाद किसी पर नाज़िल नाज़िल करने वाला हो और हमें दुनिया में भी नेकी अता कर और आख़ेरत में भी और अपनी रहमत से हमें दोज़ख़ के अज़ाब से महफ़ूज़ रख।

 

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَبَلِّغْ بِإِيمَانِي أَكْمَلَ الإِيمَانِ وَاجْعَلْ يَقِينِي أَفْضَلَ الْيَقِينِ وَانتَهِ بِنِيَّتِي إِلَى أَحْسَنِ النِّيَّاتِ، وَبِعَمَلِي إِلَى أَحْسَنِ الأَعْمَاِل اللَّهُمَّ وَفِّرْ بِلُطْفِكَ نِيَّتِي وَصَحِّحْ بِمَا عِندَكَ يَقِينِي  وَاسْتَصْلِحْ بِقُدْرَتِكَ مَا فَسَدَ مِنِّي اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَاكْفِنِي مَا يَشْغَلُنِي الإِهْتِمَامُ بِهِ وَاسْتَعْمِلْنِي بِمَا تَسْألُنِي غَداً عَنْهُ وَاسْتَفْرِغْ أَيَّامِي فِيمَا خَلَقْتَنِي لَهُ وَاغْنِنِي وَأَوْسِعْ عَلَيَّ فِي رِزْقِكَ وَلا تَفْتِنِّي بِالنَّظَرِ وَأَعِزَّنِي وَلا تَبْتَلِيَنِّي بِالْكِبْرِ وَعَبِّدْنِي لَكَ وَلا تُفْسِدْ عِبِادَتِي بِالعُجْبِ وَأَجْرِ لِلنَّاسِ عَلَى يَدَيَّ الْخَيْرَ وَلا تَمْحَقْهُ بِالْمَنِّ وَهَبْ لِي مَعَاِلي الأَخْلاَقِ وَاعْصِمْنِي مِنَ الْفَخْرِ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَلا تَرْفَعْنِي فِي النَّاسِ دَرَجَةً إِلا حَطَطْتَنِي عِندَ نَفْسِي مِثْلَهَا وَلا تُحْدِثْ لِي عِزّاً ظَاهِراً إِلاَّ أَحْدَثْتَ لِي ذِلَّةً بَاطِنَةً عِندَ نَفْسِي بِقَدَرِهَا اللَّهُمَّ صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَّآلِ مُحَمَّدٍ وَمَتِّعْنِي بِهُدَىً صَاِلحٍ لا أَسْتَبْدِلُ بِهِ، وَطَرِيقَةِ حَقٍّ لا أَزِيغُ عَنْهَا، وَنِيَّةِ رَشْدٍ لا أَشُكُّ فِيهَا وَعَمِّرْنِي مَا كَانَ عُمْرِي بِذْلَةً فِي طَاعَتِكَ، فَإِذَا كَانَ عُمْرِي مَرْتَعاً لِلشَّيْطَانِ فَاقْبِضْنِي إِلَيْكَ، قَبْلَ أَن يَّسْبِقَ مَقْتُكَ إِلَيَّ، أَوْ يَسْتَحْكِمَ غَضَبُكَ عَلَيَّ اللَّهُمَّ لا تَدَعْ خِصْلَةً تُعَابُ مِنِّي إِلاَّ أَصْلَحْتَهَا وَلا عَائِبَةً أُؤَنَّبُ بِهَا إِلاَّ حَسَّنتَهَا، وَلا أُكْرُومَةً فِيَّ نَاقِصَةً إِلاَّ أَتْمَمْتَهَا اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِ مُحَمَّدٍ وَأَبْدِلْنِي مِنْ بُغْضَةِ أَهْلِ الشَّنَانَ الْمَحَبَّةَ وَمِنْ حَسَدِ أَهْلِ الْبَغْيِ الْمَوَدَّةَ، وَمِن ظِنَّةِ أَهْلِ الصَّلاَحِ الثِّقَةَ، وَمِنْ عَدَاوَةِ الأَدْنَيْنَ الْوَلايَةَ، وَمِنْ عُقُوقِ ذَوِي الأَرْحَامِ الْمَبَرَّةَ، وَمِنْ خِذْلانِ الأَقْرَبِينَ النُّصْرَةَ، وَمِنْ حُبِّ الْمُدَارِينَ تَصْحِيحَ الْمِقَةِ، وَمِن رَّدِّ الْمُلاَبِسِينَ كَرَمَ الْعِشْرَةِ، وَمِن مَّرَارَةِ خَوْفِ الظَّالِمِينَ حَلاَوَةَ الأَمنَةَ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَاجْعَل لِّي يَداً عَلى مَن ظَلَمَنِي، وَلِسَاناً عَلَى مَنْ خَاصَمَنِي، وَظَفَراً بِمَنْ عَانَدَنِي وَهَبْ لِي مَكْراً عَلَى مَن كَايَدَنِي، وَقُدْرَةً عَلَى مَنِ اضْطَهَدَنِي، وَتَكْذِيباً لِمَن قَصَبَنِي، وَسَلاَمَةً مِّمَّن تَوَعَّدَنِي وَوَفِّقْنِي لِطَاعَةِ مَن سَدَّدَنِي، وَمُتَابَعَةِ مَنْ أَرْشَدَنِي اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَسَدِّدْنِي لأَنْ أُعَارِضَ مَنْ غَشَّنِي بِالنُّصْحِ، وَأَجْزِي مَنْ هَجَرَنِي بِالْبِرِّ، وَأُثِيبَ مَنْ حَرَمَنِي بِالْبَذْلِ، وَأُكَافِئَ مَن قَطَعَنِي بِالصِّلَةِ، وَأُخَاِلفَ مَنْ اغْتَابَنِي إِلَى حُسْنِ الذِّكْرِ، وَأَنْ أَشْكُرَ الْحَسَنَةَ، وَأُغْضِي عَنِ السَّيِّئَةِ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَحَلِّنِي بِحِلْيَةِ الصَّاِلحِينَ وَأَلْبِسْنِي زِينَةَ المُتَّقِينَ فِي بَسْطِ الْعَدْلِ وَكَظْمِ الْغَيْظِ وَإِطْفَاءِ النَّائِرَةِ وَضَمِّ أَهْلِ الْفُرْقَةِ وَإِصْلاَحِ ذَاتِ الْبَيْنِ وَإِفْشِاءِ الْعَارِفَةِ وَسَتْرِ الْعَائِبَةِ وَلِينِ الْعَرِيكَةِ وَخَفْضِ الْجَنَاحِ وَحُسْنِ السِّيرَةِ وَسُكُونِ الرِّيحِ وَطِيبِ الْمُخَالَفَةِ وَالسَّبْقِ إِلَى الْفَضِيلَةِ وَإِيثَارِ التَّفَضُّلِ وَتَرْكِ التَّعْيِيرِ وَالإِفْضَاِل عَلَى غَيْرِ الْمُسْتَحِقِّ وَالْقَوْلِ بِالْحَقِّ وَإِنْ عَزَّ وَاسْتِقْلاَلِ الْخَيْرِ وَإِن كَثُرَ مِن قَوْلِي وَفِعْلِي وَاسْتِكْثَارِ الْشَّرِ وَإِن قلَّ مِن قَوْلِي وَفِعْلِي وَأَكْمِلْ ذَلِكَ لِي بِدَوَامِ الطَّاعَةِ، وَلُزُومِ الْجَمَاعَةِ، وَرَفْضِ أَهْلِ الْبِدَعِ، وَمُسْتَعْمِلِي الرَّأْيِ الْمُخْتَرَعِ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَاجْعَلْ أَوْسَعَ رِزْقِكَ عَلَيَّ إِذَا كَبِرْتُ، وَأَقْوَى قُوَّتِكَ فِيَّ إِذَا نَصِبْتُ وَلا تَبْتَلِيَنِي بِالْكَسَلِ عَنْ عِبَادَتِكَ، وَلا الْعَمى عَن سَبِيلِكَ، وَلا بِالتَّعَرُّضِ لِخِلاَفِ مَحَبَّتِكَ، وَلا مُجَامَعَةِ مَن تَفَرَّقَ عَنْكَ، وَلا مُفَارَقَةِ مَنِ اجْتَمَعَ إِلَيْكَ اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي أَصُولُ بِكَ عِندَ الضَّرُورَةِ، وَأَسْألُكَ عِندَ الْحَاجَةِ، وَأَتَضَرَّعُ إِلَيْكَ عِندَ الْمَسْكَنَةِ وَلا تَفْتِنِّي بِالإِسْتِعَانَةِ بِغَيْرِكَ إِذَا اضْطُرِرْتُ، وَلا بِالْخُضُوعِ لِسُؤَاِل غَيْرِكَ إِذَا افْتَقَرْتُ، وَلا بِالتَّضَرُّعِ إِلَى مَن دُونِكَ إِذَارَهِبْتُ فَأَسْتَحِقُّ بِذَلِكَ خِذْلانَكَ وَمَنْعَكَ وَإِعْرَاضَكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحَمِينَ اللَّهُمَّ اجْعَلْ مَا يُلْقِي الشَّيْطَانُ فِي رَوْعِي منِ التَّمَنِّي وَالتَّظَنِّي وَالْحَسَدِذِكْراً لِعَظَمَتِكَ، وَتَفَكُّراً فِي قُدْرَتِكَ، وَتَدْبِيراً عَلَى عَدُوِّكَ، وَمَا أَجْرَى عَلَى لِسَانِى مِن لَّفْظَةِ فُحْشٍ أَوْ هَجْرٍ أَوْ شَتْمِ عِرْضٍ أَوْ شَهَادَةِ بَاطِلٍ أَوِ اغْتِيَابِ مُؤْمِنٍ غَائِبٍ أَوْ سَبِّ حَاضِرٍ أَوْ مَا أَشْبَهَ ذَلِكَ، نُطْقاً بِالْحَمْدِ لَكَ، وَإِغْرَاقاً فِي الثَّنَاءِ عَلَيْكَ وَذَهَاباً فِي تَمْجِيدِكَ وَشُكْراً لِّنِعْمَتِكَ وَاعْتِرَافاً بِإِحْسَانِكَ وَإِحْصَاءاً لِّمِنَنِكَ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَلا أُظْلَمَنَّ وَأَنتَ مُطِيقٌ لِّلدَّفْعِ عَنِّيوَلا أَظْلِمَنَّ وَأَنتَ الْقَادِرُ عَلى الْقَبْضِ مِنِّيوَلا أَضِلَّنَّ وَقَدْ أَمْكَنَتْكَ هِدَايَتِيوَلا أَفْتَقِرَنَّ وَمِنْ عِندِكَ وُسْعِي وَلا أَطْغَيَنَّ وَمِنْ عِندِكَ وُجْدِي اللَّهُمَّ إِلَى مَغْفِرَتِكَ وَفَدتُّ وَإِلَى عَفْوِكَ قَصَدتُّ وَإِلَى تَجَاوُزِكَ اشْتَقْتُ وَبِفَضْلِكَ وَثِقْتُ وَلَيْسَ عِندِي مَا يُوجِبُ لِي مَغْفِرَتَكَ وَلا فِي عَمَلِي مَا أَسْتَحِقُّ بِهِ عَفْوَكَ وَمَا لِي بَعْدَ أَنْ حَكَمْتُ عَلَى نَفْسِي إلاَّ فَضْلُكَ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَتَفَضَّلْ عَلَيَّ اللَّهُمَّ وَأَنطِقْنِي بِالْهُدَى وَأَلْهِمْنِي التِّقْوَى وَوَفِّقْنِي للَّتِي هِي أَزْكَى وَاسْتَعْمِلْنِي بِمَا هُوَ أَرْضَى اللَّهُمَّ اسْلُكْ بِي الطَّرِيقَةَ الْمُثْلَى وَاجْعَلْنِي عَلَى مِلَّتِكَ أَمُوتُ وَأَحْيَا اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَمَتِّعْنِي بِالإقْتِصَادِ وَاجْعَلْنِي مِنْ أَهْلِ السَّدَادِ، وَمِنْ أَدِلَّةِ الرَّشَادِ، وَمِن صَاِلحِي الْعِبَادِ وَارْزُقْنِي فَوْزَ الْمَعَادِ، وَسَلاَمَةَ الْمِرْصَادِ اللَّهُمَّ خُذْ لِنَفْسِكَ مِن نَّفْسِي مَا يُخَلِّصُهَا وَأَبْقِ لِنَفْسِي مِن نَّفْسِي مَا يُصْلِحُهَا، فَإِنَّ نَفْسِي هَاِلكَةً أَوْ تَعْصِمَهَا اللَّهُمَّ أَنتَ عُدَّتِي إِنْ حَزِنتُ وَأَنتَ مُنتَجَعِي إِنْ حُرِمْتُ وَبِكَ اسْتِغَاثَتِي إِن كُرِثْتُ وَعِندَكَ مِمَّا فَاتَ خَلَفٌ، وَلِمَا فَسَدَ صَلاَحٌ، وَفِيمَا أَنكَرْتَ تَغْيِيرٌ فَامْنُنْ عَلَيَّ قَبْلَ الْبَلاءِ بِالْعَافِيَةِ، وَقَبْلَ الطَّلَبِ بِالْجِدَةِ، وَقَبْلَ الضَّلاَلِ بِالرَّشَادِ وَاكْفِنِي مَؤُونَةَ مَعَرَّةِ الْعِبَادِ وَهَبْ لِي أَمْنَ يَوْمِ الْمَعَادِ وَامْنَحْنِي حُسْنَ الإِرْشَادِ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَادْرَأْْ عَنِّي بِلُطْفِكَ وَاغْذُنِي بِنِعْمَتِكَ وَأَصْلِحْنِي بِكَرَمِكَ وَدَاوِنِي بِصُنعِكَ وَأَظِلَّنِي فِي ذَرَاكَ وَجَلِّلْنِي رِضَاكَ وَوَفِّقْنِي إِذَا اشْتَكَلَتْ عَلَيَّ الأُمُورُ لأَهْدَاهَا، وَإِذَا تَشَابَهَتِ الأَعْمَالُ لأَزْكَاهَا وَإِذَا تَنَاقَضَتِ المِلَلُ لأَرْضَاهَا اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَتَوِّجْنِي بِالْكِفَايَةِ وَسُمْنِي حُسْنَ الْوِلاَيةِ وَهَبْ لِي صِدْقَ الْهِدَايَةِ وَلا تَفْتِنِّي بِالسَّعَةِ وَامْنَحْنِي حُسْنَ الدَّعَةِ وَلا تَجْعَلْ عَيْشِي كَداًّ كَداًّ وَلا تَرُدَّ دُعَائِي عَلَيَّ رَدّاً فَإِنِّي لا أَجْعَلُ لَكَ ضِدّاً وَلا أَدْعُو مَعَكَ نِدّاً اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَامْنَعْنِي مِنَ السَّرَفِ وَحَصِّن رِّزْقِي مِنَ التَّلَفِ وَوَفِّرْ مَلَكَتِي بِالْبَرَكَةِ فِيهِ وَأَصِبْ بِي سَبِيلَ الْهِدَايَةِ لِلْبِرِّ فِيمَا أُنفِقُ مِنْهُ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَاكْفِنِي مَؤُونَةَ الإكْتِسَابِ، وَارْزُقْنِي مِنْ غَيْرِ احْتِسَابٍ فَلا أَشْتَغِلَ عَنْ عِبَادَتِكَ بِالطَّلَبِ، وَلا أَحْتَمِلَ إِصْرَ تَبِعَاتِ الْمَكْسَبِ اللَّهُمَّ فَأَطْلِبْنِي بِقُدْرَتِكَ مَا أَطْلُبُ وَأَجِرْنِي بِعِزَّتِكَ مِمَّا أَرْهَبُ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَصُن وَّجْهِي بِالْيَسَارِ، وَلا تَبْتَذِلْ جَاهِي بِالإِقْتَارِ فَأَسْتَرْزِقَ أَهْلَ رِزْقِكَ، وَأَسْتَعْطِي شِرَارَ خَلْقِكَ فَأَفْتَتِنَ بِحَمْدِ مَنْ أَعْطَانِي، وَأُبْتَلي بِذَمِّ مَن مَّنَعَنِي وَأَنتَ مِن دُونِهِمْ وَلِيُّ الإِعْطَاءِ وَالْمَنْعِ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَارْزُقْنِي صِحَّةً فِي عِبَادَةٍ، وَفَرَاغاً فِي زَهَادَةٍ، وَعِلْماً فِي اسْتِعْمَالٍ، وَوَرَعاً فِي إِجْمَالٍ اللَّهُمَّ اخْتِم بِعَفْوِكَ أَجَلِي وَحَقِّقْ فِي رَجَاءِ رَحْمَتِكَ أَمَلِي وَسَهِّلْ إِلَى بُلُوغِ رِضَاكَ سُبُلِي وَحَسِّن فِي جَمِيعِ أَحْوَاِلي عَمَلِي اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ وَنَبِّهْنِي لِذِكْرِكَ فِي أَوْقَاتِ الْغَفْلَةِ وَاسْتَعْمِلْنِي بِطَاعَتِكَ في أَيَّامِ الْمُهْلَةِ وَانْهَجْ لِي إِلَى مَحَبَّتِكَ سَبِيلاً سَهْلَةً أَكْمِلْ لِي بِهَا خَيْرَ الدُّنيَا وَالآخِرَةِ اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَّآلِهِ كَأَفْضَلِ مَا صَلَّيْتَ عَلَى أَحَدٍ مِّنْ خَلْقِكَ قَبْلَهُ وَأَنتَ مُصَلٍّ عَلى أَحَدٍ بَعْدَهُ َآتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَّفِي الآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنِي بِرَحْمَتِكَ عَذَابَ النَّارِ إِنَّكَ عَلَى كُلِّ شَيٍْء قَدِيرٌ، وَهُوَ عَلَيْكَ يَسِيرٌ 

 

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