सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 2 - रसूल अकरम (स:अ:व:व) पर दरूद व सलाम 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये हैं जिसने अपने पैग़म्बर (स0) मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम की बअसत से हम पर वह एहसान फ़रमाया जो न गुज़िश्ता उम्मतों पर किया और न पहले लोगों पर अपनी इस क़ुदरत की कार फ़रमाई है जो किसी शै से आजिज़ व दरमान्दा नहीं होती अगरचे वह कितनी ही बड़ी हो। और कोई चीज़ उसके क़ब्ज़े से निकलने नहीं पाती अगरचे वह कितनी ही लतीफ़ व नाज़ुक हो, उसने अपने मख़लूक़ात में हमें आखि़री उम्मत क़रार दिया, और इन्कार करने वालों पर गवाह बनाया, और अपने लुत्फ़ व करम से कम तादाद वालों के मुक़ाबले में हमें कसरत दी। ऐ अल्लाह! तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर जो तेरी वही के अमानतदार तमाम मख़लूक़ात में तेरे बरगुज़ीदा, तेरे बन्दों में पसन्दीदा रहमत के पेशवा, ख़ैर व सआदत के पेशरौ और बरकत का सरचश्मा थे जिस तरह उन्होंने तेरी शरीयत की ख़ातिर अपने को मज़बूती से जमाया और तेरी राह में अपने जिस्म को हर तरह के आज़ार का निशाना बनाया और तेरी तरफ़ दावत देने के सिलसिले में अपने अज़ीज़ों से दुश्मनी का मुज़ाहिरा किया, और तेरी रज़ामन्दी के लिये अपने क़ौम क़बीले से जंग की और तेरे दीन को ज़िन्दा करने के लिये सब रिश्ते नाते क़ता कर लिये, नज़दीक के रिश्तेदारों को इन्कार की वजह से दूर कर दिया और दूर वालों को इक़रार की वजह से क़रीब किया, और तेरी वजह से दूर वालों से दोस्ती और नज़दीक वालों से दुश्मनी रखी और तेरा पैग़ाम पहुंचाने के लिये तकलीफ़ें उठाईं और दीन की तरफ़ दावत देने के सिलसिले में ज़हमतें बरदाश्त कीं और अपने नफ़्स को उन लोगों के पन्द व नसीहत करने में मसरूफ़ रखा जिन्होंने तेरी दावत को क़ुबूल किया, और अपने महल सुकूनत व मक़ामे रिहाइश और जाए विलादत व वतन मालूफ़ से परदेस की सरज़मीन और दूर दराज़ मक़ाम की तरफ़ महज़ इस मक़सद से हिजरत की के तेरे दीन को मज़बूत करें और तुझसे कुफ्र इख़्तिेयार करने वालों पर ग़लबा पाएं, यहाँ तक के तेरे दुश्मनों के बारे में जो उन्होंने चाहा था वह मुकम्मल हो गया और तेरे दोस्तों (को जंग व जेहाद पर आमादा करने) की तदबीरें कामिल हो गईं तो वह तेरी नुसरत से फतेह व कामरानी चाहते हुए और अपनी कमज़ोरी के बावजूद तेरी मदद की पुश्तपनाही पर दुश्मनों के मुक़ाबले के लिये उठ खड़े हुए और उनके घरों के हुदूद में उनसे लड़े और उनकी क़यामगाहों के वुसत में उन पर टूट पड़े। यहाँ तक के तेरा दीन ग़ालिब और तेरा कलमा बलन्द होकर रहा। अगरचे मुशरिक उसे नापसन्द करते रहे। ऐ अल्लाह! उन्होंने तेरी ख़ातिर जो कोशिशें कीं हैं उनके एवज़ उन्हें जन्नत में ऐसा बलन्द दरजा अता कर के कोई मरतबे में उनके बराबर न हो सके और न मन्ज़िलत में उनका हमपाया क़रार पा सके, और न कोई मुक़र्रब बारगाह फ़रिश्ते और न कोई फर्सतादा पैग़म्बर तेरे नज़दीक उनका हमसर हो सके और उनके अहलेबैत (अ0) अतहार और मोमेनीन की जमाअत के बारे में जिस क़ाबिले क़ुबूल शिफ़ाअत का तूने उनसे वादा फ़रमाया है उस वादे से बढ़कर उन्हें अता फ़रमा, ऐ वादे के नाफ़िज़ करने वाले क़ौल के पूरा करने और बुराइयों को कई गुना ज़ायद अच्छाइयों से बदल देने वाले बेशक तू फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक है।
 

 

 وَالْحَمْدُ للهِ الَّذِي مَنَّ عَلَيْنَا بِمُحَمَّد نَبِيِّهِ صَلَّى الله عَلَيْهِ وَآلِهِ دُونَ الاُمَمِ الْمَاضِيَةِ وَالْقُـرُونِ السَّالِفَةِ بِقُدْرَتِهِ الَّتِي لاَ تَعْجِزُ عَنْ شَيْء وَ إنْ عَظُمَ وَ لا يَفُوتُهَا شَيءٌ وَإنْ لَطُفَ، فَخَتَمَ بِنَاعَلَى جَمِيع مَنْ ذَرَأَ وَ جَعَلَنَا شُهَدَاءَ عَلَى مَنْ جَحَدَ وَكَثَّرَنا بِمَنِّهِ عَلَى مَنْ قَلَّ همَّ فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّد أَمِينِكَ عَلَى وَحْيِكَ وَنَجِيبِكَ مِنْ خَلْقِكَ وَ صَفِيِّكَ مِنْ عِبَادِكَ إمَامِ الرَّحْمَةِ وَقَائِدِ الْخَيْرِ وَ مِفْتَاحِ الْبَرَكَةِ كَمَا نَصَبَ لاَِمْرِكَ نَفْسَهُ وَ عَرَّضَ فِيْكَ لِلْمَكْرُوهِ بَدَنَهُ وَكَاشَفَ فِي الدُّعَآءِ إلَيْكَ حَامَّتَهُ وَحَارَبَ فِي رِضَاكَ أسْرَتَهُ وَقَطَعَ فِىْ إحْياءِ دِينِكَ رَحِمَهُ وَاقصَى الادْنَيْنَ عَلَى جُحُـودِهِمْ وَقَرَّبَ الاقْصَيْنَ عَلَى اسْتِجَابَتِهِمْ لَكَ وَ والَى فِيكَ الابْعَدِينَوَعَادى فِيكَ الاقْرَبِينَ وَأدْأبَ نَفْسَهُ فِي تَبْلِيغِ رِسَالَتِكَ وَأَتْعَبَهَا بِالدُّعآءِ إلَى مِلَّتِكَ وَشَغَلَهَا بِالنُّصْحِ لاَِهْلِ دَعْوَتِكَ وَهَاجَرَ إلَى بِلاَدِ الْغُرْبَةِ وَمحَلِّ النَّأيِ عَنْ مَوْطِنِ رَحْلِهِ وَمَوْضِـعِ رِجْلِهِ وَمَسْقَطِ رَأسِهِ وَمَأنَسِ نَفْسِهِ إرَادَةً مِنْهُ لاعْزَازِ دِيْنِكَ واسْتِنْصَاراً عَلَى أَهْلِ الْكُفْرِ بِكَ حَتّى اسْتَتَبَّ لَهُ مَا حَاوَلَ فِي أَعْدَائِكَوَاسْتَتَمَّ لَهُ مَا دَبَّرَ فِي أوْلِيآئِكَ فَنَهَدَ إلَيْهِمْ مُسْتَفْتِحاً بِعَوْنِكَ وَمُتَقَوِّياً عَلَى ضَعْفِهِ بِنَصْرِكَ فَغَزَاهُمْ فِي عُقْرِ دِيَارِهِمْ وَهَجَمَ عَلَيْهِمْ فِي بُحْبُوحَةِ قَرَارِهِمْ حَتّى ظَهَر أَمْرُكَ وَعَلَتْ كَلِمَتُكَ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ اللَهُمَّ فَارْفَعْهُ بِمَا كَدَحَ فِيكَ إلَى الدَّرَجَةِ الْعُلْيَا مِنْ جَنَّتِكَ حَتَّى لاَ يُسَاوَى فِي مَنْزِلَة وَلا يُكَاْفَأَ فِي مَرْتَبَة وَلاَ يُوَازِيَهُ لَدَيْكَ مَلَكٌ مُقَرَّبٌ وَلا نبيٌّ مُرْسَلٌ وَعَرِّفْهُ فِي أهْلِهِ الطّاهِرِينَ ِنْ حُسْنِ الشَّفَاعَةِ أجَلَّ مَا وَعَدْتَهُ يَا نَافِذَ الْعِدَةِ وَافِىَ الْقَوْلِ يَا مُبَدِّلَ السّيِّئات بِأضْعَافِهَا مِنَ الْحَسَنَاتِ إنَّكَ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ الْجَوَادُ اَلْكَرِيمُ


  

खुलासा : यह दुआ का दूसरा इफ़्तेताहिया है जो पहले इफ़्तेताहिया के लिये एक तकमिला की हैसियत रखता है। इसलिये वादो अतफ़ के ज़रिये इसका सिलसिला पहले इफ़्तेताहिया से जोड़ दिया गया है। पहला इफ़्तेताहिया हम्द व सनाए इलाही पर मुश्तमिल था और यह रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम पर दुरूदो सलाम के सिलसिले में है। हम्द व सताइश और दुरूदो सलाम एक दूसरे से मुरत्तब और एक क़ुदरती तरतीब के ज़ेरे असर एक दूसरे से वाबस्ता हैं। चुनान्चे जब ख़ुदावन्दे आलम के सि एहसान व इनआम पर नज़र जाती है के इसने नौए इन्सानी की हिदायत के लिये पैग़म्बरों और दीन के रहनुमाओं का सिलसिला जारी किया ताकि वही व तन्ज़ील के ज़रिये हिदायत की तालीम होती रहे तो बेसाख़्ता ज़बान इसकी तम्हीद व सताइश के इस्तेहक़ाक़ का एतराफ़ करने पर मजबूर हो जाती है। के जिसने माद्दी तरबियत के सरो सामान के साथ रूहानी तरबियत के सामान की भी तकमील की, तो जब ख़ुदा के इनआमात उसकी हम्द व सताइश के मोहरक होते हैं तो जो इरफ़ाने इलाही का ज़रिया हों और इन्सानी सलाहियतों को इस क़ाबिल बनाएं के इनमें हिदायत के अनासिर नशो नुमा पा सकें। तहमीदे इलाही के बाद एहसान शिनासी का तक़ाज़ा यह होगा के इन हस्तियों से भी दुरूद व सलाम के ज़रिये इज़हारे अक़ीदत व अरादत किया जाए और इन ज़र्राते मुक़द्देसा में सबसे अकमल व अफ़ज़ल हस्ती रसूले अकरम (स0) की थी जिन्होंने तहज़ीबे नफ़्स व तरक़्क़ी रूहानी की राहें बताईं और सिदाक़त व रूहानियत की तालीम से मुर्दा इन्सानियत को निशाते सानिया अता किया। लेहाज़ा हम्द के बाद दुरूद व सलाम को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता। चुनांचे दुआ के साथ जिस तरह हम्द को मुनज़्ज़म किया गया है उसी तरह दुरूदो सलवात को भी इस्तेजाबते दुआ का ज़रिया क़रार दिया गया है। चुनांचे अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम का इरशाद हैः-

जब अल्लाह तआला से कोई हाजत तलब करो तो पहले रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम पर दुरूद भेजो फिर अपनी हाजत मांगो। क्योंके ख़ुदा इससे बलन्दतर है के इससे दो हाजतें तलब की जाएं और एक पूरी कर दे और एक रोक ले।

इमाम अलैहिस्सलाम ने दुरूद व सलाम के सिलसिले में आँहज़रत (स0) की शख़्सियत पर इस तरह जंचे तुले अल्फ़ाज़ में रोशनी डाली है के उनकी ज़िन्दगी के तमाम गोशों की मुकम्मल तस्वीर निगाहों के सामने आ जाती है। चुनान्चे इन कलेमात से आप (स0) की हस्ती के हस्बे ज़ैल औसाफ़ व कमालात वाज़ेह होते हैं। आप (स0) वहीए इलाही के हामिल, पाकीज़ा नसब और बरगुज़ीदा ख़लाएक़ थे। ख़ुदावन्दे आलम ने आप (स0) को तमाम अम्बिया के आखि़र में भेजा जिसके बाद सिलसिलए नबूवत ख़त्म कर दिया। लेहाज़ा आप (स0) आखि़री पैग़म्बर (स0) और आप (स0) की उम्मत आखि़री उम्मत है और उनके अहलेबैत (अ0) लोगों के आमाल के निगराँ और उनके गवाह हैं। आप (स0) रहमत व राफ़बत का मुजस्समा और ख़ैर व बरकत का सरचश्मा थे, उनकी दोस्ती व दुश्मनी का मेयार सिर्फ़ ईमान व अमले सालेह है और इस सिलसिले में अपने और बेगाने में कोई इम्तियाज़ व तफ़रिक़ा रवा नहीं रखा। उन्होंने तबलीग़े एहकाम और आलाए कलेमतुल्लाह के लिये जान की बाज़ी लगा दी। दीन की ख़ातिर दुख सहे, मुसीबतें झेलीं घर बार छोड़ा और हिजरत इख़्तेयार की और अपनी सलाहियते नज़्म व नस्क़ से से मुसलमानों की शीज़ाज़ा बन्दी की और उनकी फ़लाह व निजाह का सामान किया और हर तरह के ख़तरात का मुक़ाबले करते हुए दुश्मनों से सफ़आरा हुए और किसी मौक़े पर अपनी क़ूवत व ताक़त पर भरोसा नही किया बल्कि हमेशा ख़ुदा की नुसरत व ताईद के ख़्वाहाँ और उसकी मदद के तालिब रहे और आखि़र हुस्ने नीयत व हुस्ने अमल की बदौलत अन्जामकार की कामयाबी उन्हें नसीब हुई और क़ुबूलियते शिफ़ाअत के दरजए रफ़िया पर फ़ाएज़ हुए।

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