सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 17 - शैतान के शर से महफूज़ रहने की दुआ 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ अल्लाह! हम षैतान मरदूद के वसवसों, मक्रों और हीलों से और उसकी झूटी तिफ़्ल तसल्लियों पर एतमाद करने और उसके हथकण्डों से तेरे ज़रिये पनाह मांगते हैं और इस बात से के उसके दिल में यह तमअ व ख़्वाहिष पैदा हो के वह हमें तेरी इताअत से बहकाए और तेरी मासियत के ज़रिये हमारी रूसवाई का सामान करे या यह के जिस चीज़ को वह रंग व रौग़न से आरास्ता करे वह हमारी नज़रों में खुब जाए या जिस चीज़ को वह बदनुमा ज़ाहिर करे वह हमें षाक़ गुज़रे। ऐ अल्लाह! तू अपनी इबादत के ज़रिये उसे हमसे दूर कर दे और तेरी मोहब्बत में मेहनत व जाँफ़िषानी करने के बाएस उसे ठुकरा दे और हमारे और उसके दरमियान एक ऐसा परदा जिसे वह चाक न कर सके, और एक ऐसी ठोस दीवार जिसे वह तोड़ न सके हाएल कर दे। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और उसे हमारे बजाए अपने किसी दुष्मन के बहकाने में मसरूफ़ रख और हमें अपने हुस्ने निगेहदाष्त के ज़रिये उससे महफ़ूज़ कर दे। उसके मक्रो फ़रेब से बचा ले और हमसे रूगर्दां कर दे और हमारे रास्ते से उसके नक़्षे क़दम मिटा दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें वैसी ही (महफ़ूज़) हिदायत से बहरामन्द फ़रमा जैसी उसकी गुमराही (मुस्तहकम) है और हमें उसकी गुमराही के मुक़ाबले में तक़वा व परहेज़गारी का ज़ादे राह दे और उसकी हलाकत आफ़रीन राह के खि़लाफ़ रष्द और तक़वा के रास्ते पर ले चल। ऐ अल्लाह! हमारे दिलों में उसे अमल व दख़ल का मौक़ा न दे और हमारे पास की चीज़ों में उसके लिये मन्ज़िल मुहय्या न कर। ऐ अल्लाह वह जिस बेहूदा बात को ख़ुषनुमा बनाके हमें दिखाए वह हमें पहचनवा दे और जब पहचनवा दे तो उससे हमारी हिफ़ाज़त भी फ़रमा। और हमें उसको फ़रेब देने के तौर तरीक़ों में बसीरत और उसके मुक़ाबले में सरो सामान की तैयारी की तालीम दे और इस ख़्वाबे ग़फ़लत से जो उसकी तरफ़ झुकाव का बाएस हो, होषियार कर दे और अपनी तौफ़ीक़ से उसके मुक़ाबले में कामिले नुसरत अता फ़रमा। बारे इलाहा! उसके आमाल से नापसन्दीदगी का जज़्बा हमारे दिलों में भर दे और उसके हीलों को तोड़ने की तौफ़ीक़ करामत फ़रमा। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और षैतान (लानतुल्लाह) के तसर्रूत को हमसे हटा दे और इसकी उम्मीदें हमसे क़ता कर दे और हमें गुमराह करने की हिरस व आज़ से उसे दूर कर दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे बाप दादाओं, हमारी माओं, हमारी औलादों, हमारे क़बीले वालों, अज़ीज़ों, रिष्तेदारों और हमसाये में रहने वाले मोमिन मर्दों और मोमिना औरतों को उसके षर से एक मोहकम जगह हिफ़ाज़त करने वाले क़िला और रोक थाम करने वाली पनाह में रख और उससे बचा ले जाने वाली ज़र हैं उन्हें पहना और उसके मुक़ाबले में तेज़ धार वाले हथियार उन्हें अता कर, बारे इलाहा! इस दुआ में उन लोगों को भी षामिल कर जो तेरी रूबूबियत की गवाही दें और दुई के तसव्वुर के बग़ैर तुझे यकता समझें और हक़ीक़ते उबूदियत की रोषनी में तेरी ख़ातिर उसे दुष्मन रखें और इलाही उलूम के सीखने में उसके बरखि़लाफ़ तुझसे मदद चाहें। ऐ अल्लाह! जो गिरह वह लगाए उसे खोल दे, जो जोड़े उसे तोड़ दे। और जो तदबीर करे उसे नाकाम बना दे, और जब कोई इरादा करे उसे रोक दे और जिसे फ़राहम करे उसे दरहम बरहम कर दे। ख़ुदाया! उसके लष्कर को षिकस्त दे, उसके मक्रो फ़रेब को मलियामेट कर दे, उसकी पनाहगाह को ढा दे और उसकी नाक रगड़ दे। ऐ अल्लाह। हमें उसके दुष्मनों में षामिल कर और उसके दोस्तों में षुमार होने से अलैहदा कर दे ताके वह हमें बहकाए तो उसकी इताअत न करें और जब हमें पुकारे तो उसकी आवाज़ पर लब्बैक न कहें और जो हमारा हुक्म माने हम उसे इससे दुष्मनी रखने का हुक्म दें और जो हमारे रोकने से बाज़ आए उसे इसकी पैरवी से मना करें। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) पर जो तमाम नबियों के ख़ातम और सब रसूलों के सरताज हैं और उनके अहलेबैत पर जो तय्यब व ताहिर हैं और हमारे अज़ीज़ों, भाइयों और तमाम मोमिन मर्दों और मोमिना औरतों को उस चीज़ से पनाह में रख जिससे हमने पनाह मांगी है और जिस चीज़ से ख़ौफ़ खाते हुए हमने तुझसे अमान चाही है उससे अमान दे और जो दरख़्वास्त की है उसे मन्ज़ूर फ़रमा और जिसके तलब करने में ग़फ़लत हो गई है उसे मरहमत फ़रमा और जिसे भूल गए हैं उसे हमारे लिये महफ़ूज़ रख और इस वसीले से हमें नेकोकारों के दरजों और अहले ईमान के मरतबों तक पहुंचा दे। हमारी दुआ क़ुबूल फ़रमा, ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

 

أَللَّهُمَّ إنَّا نَعُوذُ بِكَ مِنْ نَزَغَـاتِ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ وَكَيْدِهِ وَمَكَائِدِهِ، وَمِنَ الثِّقَةِ بِأَمَـانِيِّهِ وَمَوَاعِيدِهِ وَغُرُورِهِ وَمَصَائِدِهِ، وَأَنْ يُطْمِعَ نَفْسَهُ فِي إضْلاَلِنَا عَنْ طَاعَتِكَ وَامْتِهَانِنَا بِمَعْصِيَتِكَ، أَوْ أَنْ يَحْسُنَ عِنْدَنَا مَا حَسَّنَ لَنَا، أَوْ أَنْ يَثْقُلَ عَلَيْنَا مَا كَرَّهَ إلَيْنَا. أللَّهُمَّ اخْسَأْهُ عَنَّا بِعِبَادَتِكَ، وَاكْبِتْهُ بِدُؤوبِنَا فِي مَحَبَّتِكَ، وَاجْعَلْ بَيْنَنَا وَبَيْنَهُ سِتْراً لاَ يَهْتِكُهُ، وَرَدْماً مُصْمِتاً لا يَفْتُقُهُ. أللَّهُمَّ صَـلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِـهِ، وَاشْغَلْهُ عَنَّا بِبَعْضِ أَعْدَائِكَ،  وَاعْصِمْنَا مِنْهُ بِحُسْنِ رِعَايَتِكَ، وَاكْفِنَا خَتْرَهُ، وَوَلِّنَا ظَهْرَهُ، وَاقْطَعْ عَنَّا إثْرَهُ. اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَأَمْتِعْنَا مِنَ الْهُدَى، بِمِثْلِ ضَلاَلَتِهِ، وَزَوِّدْنَا مِنَ التَّقْوَى ضِدَّ غَوَايَتِهِ، وَاسْلُكْ بِنَـا مِنَ التُّقى خِـلافَ سَبِيلِهِ مِنَ الـرَّدى. أللَّهُمَّ لاَ تَجْعَلْ لَهُ فِي قُلُوبِنَا مَدْخَلاً وَلاَ تُوطِنَنَّ لَهُ فِيمَا لَدَيْنَا مَنْزِلاً.  اللَّهُمَّ وَمَا سَوَّلَ لَنَا مِنْ بَاطِل فَعَرِّفْنَاهُ وَإذَا عَرَّفْتَنَاهُ  فَقِنَاهُ، وَبَصِّرْنَا مَا نُكَايِدُهُ بِهِ، وَأَلْهِمْنَا مَا نُعِدُّهُ لَهُ، وَأَيْقِظْنَا عَنْ سِنَةِ الْغَفْلَةِ بِالرُّكُونِ إلَيْهِ  وَأَحْسِنْ بِتَوْفِيقِكَ عَوْنَنَا عَلَيْهِ. اللَّهُمَّ وَأَشْرِبْ قُلُوبَنَـا إنْكَارَ عَمَلِهِ، وَالْـطُفْ لَنَا فِي نَقضِ حِيَلِهِ.  أللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَحَوِّلْ سُلْطَانَهُ عَنَّا،  وَاقْطَعْ رَجَاءَهُ مِنَّا ، وادْرَأْه عَنِ الْوُلُوعِ بِنَا.  اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَاجْعَلْ آباءَنَا وَأُمَّهَاتِنَا وَأَوْلاَدَنَا وَأَهَالِينَا وَذَوِي أَرْحَامِنَا وَقَرَابَاتِنَا وَجِيْرَانَنَا  مِنَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَـاتِ مِنْهُ فِي حِرْز حَـارِز، وَحِصْن حَافِظ ، وَكَهْف مَانِع، وَألْبِسْهُمْ مِنْهُ جُنَناً وَاقِيَةً، وَأَعْطِهِمْ عَلَيْهِ أَسْلِحَةً مَاضِيَةً  أللَّهُمَّ وَاعْمُمْ بِذلِكَ مَنْ شَهِدَ لَكَ بِالرُّبُوبِيَّةِ،  وَأَخْلَصَ لَكَ بِالْوَحْدَانِيَّةِ، وَعَادَاهُ لَكَ بِحَقِيقَةِ الْعُبُودِيَّة،  وَاسْتَظْهَرَ بِكَ عَلَيْهِ فِي مَعْرِفَةِ الْعُلُومِ الرَّبَّانِيَّةِ. اللَّهُمَّ احْلُلْ مَا عَقَدَ، وَافْتقْ مَا رَتَقَ،  وَافسَخ مَا دَبَّرَ، وَثَبِّطْهُ إذَا عَزَمَ، وَانْقُضْ مَا أَبْرَمَ. اللَّهُمَّ وَاهْزِمْ جُنْدَهُ وَأَبْطِلْ كَيْدَهُ وَاهْدِمْ كَهْفَهُ وَأَرْغِمْ أَنْفَهُ. اللَّهُمَّ اجْعَلْنَا فِي نَظْم أَعْدَآئِهِ وَاعْزِلْنَا عَنْ عِدَادِ أَوْلِيَائِهِ، لا نُطِيعُ لَهُ إذَا اسْتَهْوَانَا، وَلا نَسْتَجِيبُ لَهُ إذَا دَعَانَا نَأْمُرُ بِمُنَاوَاتِهِ مَنْ أَطَاعَ أَمْرَنَا وَنَعِظُ عَنْ مُتَابَعَتِهِ مَنِ اتَّبَعَ زَجْرَنَا. اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد خَاتَمِ النَّبِيِّينَ وَسَيِّدِ الْمُرْسَلِينَ  وَعَلَى أَهْلِ بَيْتِهِ الطَّيِّبِينَ الـطَّاهِرِينَ  وَأَعِذْنَا وَأَهَـالِينَا وَإخْـوَانَنَا وَجَمِيـعَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ مِمَّا اسْتَعَذْنَا مِنْهُ، وَأَجِرْنَا مِمَّا اسْتَجَرْنَا بِكَ مِنْ خَوْفِهِ وَاسْمَعْ لَنَا مَا دَعَوْنَا بِهِ وَأَعْطِنَا مَا أَغْفَلْنَاهُ وَاحْفَظْ لَنَا مَا نَسِيْنَاهُ،  وَصَيِّرْنَا بِذَلِكَ فِي دَرَجَاتِ الصَّالِحِينَ  وَمَـرَاتِبِ الْمُؤْمِنِينَ آمينَ رَبَّ  الْعَالَمِينَ  

 

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