सहीफ़ा कामेलह - ईमाम ज़ैन अल'आबेदीन (अ:स) की दुआओँ का सहीफ़ा﴿

दुआ 11 - अंजाम अच्छा होने की दुआ 

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ वह ज़ात! जिसकी यादयाद करने वालों के लिये सरमाया-ए-इज़्ज़तऐ वह जिसका शुक्रशुक्रगुज़ारों के लिये वजहे कामरानीऐ वह जिसकी फ़रमाबरदारी फ़रमाबरदारों के लिये ज़रियाए नजात है। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और हमारे दिलों को अपनी याद में और हमारी ज़बानों को अपने शुक्रिया में और हमारे आज़ा को अपनी फ़रमानबरदारी में मसरूफ़ रखकर हर यादहर शुक्रिया और फ़रमाबरदारी से बेनियाज़ कर दे।

और अगर तूने हमारी मसरूफ़ियतों में कोई फ़राग़त का लम्हा रखा है तो उसे सलामती से हमकिनार करइस तरह के नतीजे में कोई गुनाह दामनगीर न हो और ख़स्तगी रूनुमा हो ताके बुराइयों को लिखने वाले फ़रिश्ते इस तरह पलटें के नामाए आमाल हमारी बुराईयों के ज़िक्र से ख़ाली हों और नेकियों को लिखने वाले फ़रिश्ते हमारी नेकियों को लिख कर मसरूर व शादाँ वापस होँ और जब हमारी ज़िन्दगी के दिन बीत जाएं और सिलसिलए हयात क़ता हो जाएं और तेरी बारगाह में हाज़िर होने का बुलावा आएजिसे बहरहाल आना और जिस पर बहरसूरत लब्बैक कहना है।

तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे कातिबाने आमाल हमारे जिन आमाल का शुमार करें उनमें आखि़री अमल मक़बूले तौबा को क़रार दे के इसके बाद हमारे इन गुनाहों और हमारी इन मासियतों पर जिन के हम मुरतकिब हुए हैं सरज़न्श न करे और जब अपने बन्दों के हालात जांचे तो उस पर्दे को जो तूने हमारे गुनाहों पर डाला है सब के रू-ब-रू चाक न करेबेशक जो तुझे बुलाए तू उस पर मेहरबानी करता है और जो तुझे पुकारे तू उसकी सुनता है।

 

يا مَنْ ذِكْرُهُ شَرَفٌ لِلذَّاكِرِينَ وَيَا مَنْ شُكْرُهُ فَوْزٌ لِلشَّاكِرِينَ، وَيَا مَنْ طَاعَتُهُ نَجَاةٌ لِلْمُطِيعِينَ صَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ وَاشْغَلْ قُلُوبَنَا بِذِكْرِكَ عَنْ كُلِّ ذِكْر، وَأَلْسِنَتَنَا بِشُكْرِكَ عَنْ كُلِّ شُكْر وَجَوَارِحَنَا بِطَاعَتِكَ عَنْ كُلِّ طَاعَة. فَإنْ قَدَّرْتَ لَنَا فَرَاغاً مِنْ شُغُل فَاجْعَلْهُ فَرَاغَ سَلاَمَة لا تُدْرِكُنَا فِيهِ تَبِعَةٌ وَلاَ تَلْحَقُنَا فِيهِ سَاَمَةٌ حَتَّى يَنْصَرِفَ عَنَّا كُتَّابُ السَّيِّئَاتِ بِصَحِيفَة خَالِيَة مِنْ ذِكْرِ سَيِّئاتِنَا َو يَتَوَلّى كُتَّابُ الْحَسَنَاتِ عَنَّا مَسْرُورِينَ بِمَا كَتَبُوا مِنْ حَسَنَاتِنَا . وَإذَا انْقَضَتْ أَيَّامُ حَيَاتِنَـا وَتَصَرَّمَتْ مُـدَدُ أَعْمَارِنَـا، وَاسْتَحْضَرَتْنَا دَعْوَتُكَ الَّتِي لاَ بُدَّ مِنْهَا وَمِنْ إجَابَتِهَا ، فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّد وَآلِهِ، وَاجْعَلْ خِتَامَ مَا تُحْصِي عَلَيْنَا كَتَبَةُ أَعْمَالِنَا تَوْبَةً مَقْبُولَةً لا تُوقِفُنَا بَعْدَهَا عَلَى ذَنْب اجْتَرَحْنَاهُ، وَلاَ مَعْصِيَة اقْتَرَفْنَاهَا، وَلاَ تَكْشِفْ عَنَّا سِتْراً سَتَرْتَهُ عَلَى رُؤُوسِ الأشْهَادِ يَوْمَ تَبْلُو أَخْبَارَ عِبَادِكَ إنَّكَ رَحِيمٌ بِمَنْ دَعَاكَ، وَمُسْتَجيبٌ لِمَنْ نَادَاكَ . 

 

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