|
|
मुहर्रम कर्बला और इमाम हुसैन
और जो लोग ख़ुदा की राह में शहीद किये गए उन्हें हरगिज़ मुर्दा न समझना, बल्कि वो लोग जीते जागते मौजूद हैं, और अपने परवरदिगार की तरफ से वो (तरह तरह) की रोज़ी पाते हैं : (कुरान 3 :169) ( क़ुरान - सूरा आले इमरान - आयत संख्या 169 )
घटना व उससे जुड़ी हस्तियाँ :
इमाम हुसैन (अ:स) , हज़रत मुहम्मद (स:अ:व:व) के नवासे थे, जो पैगंबर साहब की पुत्री हज़रत फातिमा (स:अ) और उनके दामाद हज़रत इमाम अली (अ:स) के पुत्र थे
680 इस्वी (AD) / 61 AH में मुहर्रम (आशूरा) की 10वीं तारीख को कर्बला (जो की इराक में है) के गर्म रेगिस्तान में अपने 72 साथियों, परिवार के सदस्यों, मित्रों और अनुयायियों के साथ, जिसमे उनका 6 महीने का एक बच्चा भी था, एक भीषण परिस्थिती में शहीद कर दिए गए! ईन शहीदों में उनके भाई हज़रत अब्बास (अ:स) (जो उनके अलमबरदार थे), उका 18 साल के बेटा हज़रत अली अकबर (अ:स) भी था! उनके काफले में बीबी जैनब (इमाम हुसैन अ:स की बहन), और उनकी 4 साल की बेटी सकीना भी थी, जो ईन अत्याचारों को सहन नहीं कर सकी और दमिश्क (सीरिया) के एक कैदखाने में मर गयी! यज़ीद जो मु'आविया का पुत्र और अबू'सुफ्यान का पोता था, अपनी 60,000 के एक बड़ी सेना के साथ, हज़रत मुहम्मद (स:अ:व:व) के परिवार 72 जनों के साथ कर्बला में एक जघन्य अपराध किया, जिस कारण हम इस घटित घटना को मुहर्रम के रूप में हज़रत मुहम्मद (स:अ:व:व) के परिवारजन पर हुए अत्याचार को शोक के रूप में मनाते हैं!
इस समूह में जो शहीद किया गया, ६ महीने का शिशु (हज़रत अली असग़र अ:स) था, जिसको तीन दिनों तक भोजन और पानी नहीं दिया गया. अली असग़र (अ:स) अपने प्यासे पिता की गोद में ऐसा प्यासा शहीद हुआ की उसके गर्दन पर तीन फल का एक भारी भरकम तीर जो ज़हर में बुझा हुआ था मारा गया! उसके पिता असग़र (अ:स) को पानी पिलाने के लिए लड़ाई के मैदान में ले गए थे और दुश्मनों ने पानी की जगह इस ज़हर बुझे तीर को दिया और बचा प्यासा शहीद हो गया!
इमाम हुसैन (अ:स) अपनी प्यासी टुकड़ी को हत्यारी सेना से बचाने के लिए आगे आये! उनका हर एक क़दम इस संकल्प की प्रतुती था के वोह अपराधी निरंकुश शासक के प्रति निष्ठा नहीं देना चाहते हैं, और हज़रत मुहम्मद (स:अ:व:व) द्वारा दिए गए इस्लामिक सिद्धांत पर अटूट विश्वास रखते हैं, चाहे उनकी मदद के लिए कोई हो न हो, चाहे उनका समर्थन कोई करे न करे!
शहीदों के सरों को काट कर भालों की नोक ओर रख़ा गया था, जबकि उनके धड़ और लाशों को घोड़ों की नालों से कुचल दिया गया, और उन्हें बगैर दफ़न के छोड़ दिया गया! इमाम (अ:स) की अग्नि परीक्षा की समाप्ती यहाँ नहीं हुई, बल्कि उनकी औरतों और बच्चों को बंदी बना कर उनपर भरपूर अत्याचार किया गया, और उन्हें कर्बला (इराक) से दमिश्क (सीरिया) तक की कठिन यार्ता पर ले जाया गया, जहाँ उन्हें एक साल से भी अधिक बंदी बना कर रख़ा गया! इन बंदियों में कर्बला में बचे केवल एक पुरुष थे जो इमाम हुसैन के पुत्र थे और उनका नाम इमाम जैनुल आबेदीन (अ:स) था! उनके बच जाने का कारण उनकी बीमारी थी जो कर्बला में अधिकतर बेहोशी की हालत में थे! इस बीमार इमाम (अ:स) को कर्बला के जंग के बाद उसकी बेहोशी, बीमारी और कमजोरी की हालत में बार बार पीटा गया, उसे ज़न्जेरों में क़ैद किया गया. इसी इमाम (अ:स) ने बाद में एक पुस्तक लिखी जिसे "अधिकारों पर ग्रन्थ" कहा जाता है और उन्हों ने एक स्मारकीय प्रार्थना लिखी जो सहीफे कामिला के नाम से मशहूर है!
इस्लामिक इतहास में, "अल हुसैन इब्ने अली (अ:स) (कर्बला के शहीदे आज़म) एक शानदार अध्याय लिखा! यह अध्याय ऐसा है जो 14 सदियों के बाद भी मुसलमानों और मानवता के दिलो दिमाग पर आज भी गूंजता है! एक आधुनिक मुस्लिम लेखक यह टिपण्णी करते हैं की कर्बला हर साल इस्लाम का नवीनीकरण करती है!
एडवर्ड गिब्बन (1737 -1794) को अपने समय का महान ब्रिटिश इतिहासकार माना जाता है! उसने लिखा, "किसी भी समय और बदले हुए दौर के लिए हुसैन (अ:स) की दुखद मौत का दृश्य, कड़े से कड़े दिल के पाठक के दिल में उनके लिए सहानुभूति जगाने के लिए काफी है" (डेकलाईन एंड फौल आफ रोमन अम्पाएर - लन्दन, 1911, वोलूम 5, pp 391 -2)
हर साल, प्रथम इस्लामिक महीने, मुहर्रम में पहली तारिख से ४० दिन तक (अर'बईन तक), दुन्या भर में शोक की सभा आयोजित की जाती है, जिसमे ईन शहीदों के कड़े इम्तिहान, आजमाइशों और सब्र का बखान होता है, और इसपर विलाप किया जाता है, और इस घटना के महत्त्व, मूल सिध्हांतों और सिखाई गए रास्तों की व्याख्या की जाती है! यह प्रथा अपने आप में एक संस्थान है जो लगातार पिछले 1400 सालों से आयोजित की जाती है!
यह शहादत बेजोड़, असमानांतर, एवं अपने आप में किसी भी मनुष्य जाती द्वारा दिया गया एक अद्वितीय बलिदान है, जिसमे मर्द, औरतें और बच्चे, सभी आयु वर्ग के लोग शामिल हैं और जिसमे हर प्रकार के मानव सम्बन्ध मौजूद हैं, अमीर-ग़रीब, मालिक-दास, बाप-बेटा, पति-पत्नी, चाचा-भतीजा, मामा-भांजा, भाई-बहन, सैन्य कमांडर-साधारण लोग, अतिथि, जो समाज के विभिन्न वर्ग और रिश्ते को दर्शाते हैं और हमें सीख देते हैं की रिश्ता परिश्थितियों के बदलाव में भी कैसे निभाया जाता है!
कर्बला की लड़ाई का कारण :
इमाम हुसैन (अ:स) ने अपने परिवार, दोस्तों और सगे सम्बन्धियों के साथ सब कुछ बलिदान कर दिया (जीवन, धन, परिवार का सम्मान) ताकि अत्याचारी और तानाशाही के ख़िलाफ़, मानवीय मूल्यों जैसे सच्चाई,न्याय, विचारों की स्वतंत्रता, शब्द और कर्म इत्यादि का बचाव किया जा सके! उनका संघर्ष का अंतिम लक्ष्य और उद्देश्य यह था की मनुष्य की आत्मा का उत्थान हो और आत्मा जागृत और हो ताकि समाज में अदूरदर्शीता में कमी आये और भौतिकवाद से परे, एक ऐसे समाज की संस्थापना हो सके जिसकी व्यवस्था न्याय और बराबरी पर आधारित हो! "इन्नमा खरज्तु लितालाबिल इस्लाही फ़ी उम्मती जददी वा अबी’’! मै इसलिए खड़ा हुआ हूँ की मै अपने नाना और पिता के द्वारा सिखाये हुए मामलों को बरक़रार रखूँ और इनमे आयी हुई कमियों में सुधार और संशोधन कर सकूं! उरीदु अन आमुरा बिल मा'अरूफ़ वा अन्हा-अनिल मुनकर"! मै लोगों को अच्छाई की तरफ आमंत्रित करना चाहता हूँ और उन्हें बुरायीओं से मना करना चाहता हूँ!
यज़ीद, जो एक दमनकारी शासक था, खुले आम अपनी पापी गतिविधियों में लिप्त था, जैसे शराब पीना, वेश्याओं के साथ समय व्यतीत करना, निर्दोष लोगों को डराना और उनकी ह्त्या करना, और विद्वानों का मजाक उडाना इत्यादि, और फिर भी अपने आप को सही उत्तराधिकारी घोषित करता था और मुस्लिम उम्मा के नेता होने का दावा करता था! इसके दमन और सैन्य बल के कारण, भयभीत समाज चुप था और डर के कारण कुछ नहीं कर पाता था!
यज़ीद ने इमाम हुसैन (अ:स) से कहा के उसकी बय'यत करें (अपनी निष्ठा साबित करें)! जब यज़ीद ने इमाम हुसैन (अ:स) से बय'यत मांगे तो उन्हों ने जवाब दिया, " हम पैगंबर के घराने से (अहलेबैत) हैं, जो पैगम्बरी को स्त्रोत है, जहां स्वर्ग से दूत उतरते हैं, हमारी ही वजह से अल्लाह ने अपने रहम की बारिश की है, जबकि यज़ीद एक पापी व्यक्ति है, एक शराबी है, निर्दोष लोगों का हत्यारा है, और जो खुलेआम पापों को भोगता है और इसी में लिप्त होता है, "मिसली ला यूबई-उ मिसला" मेरे जैसा (इमाम हुसैन अ:स) कोई भी शख्स, इस (यज़ीद) जैसे किसी भी शख्स की बय'यत नहीं कर सकता है! मैं मौत को आनंदपूर्वक शहादत की तरह देख सकता हूँ, लेकिन अपनी ज़िंदगी ज़िल्लत, पीड़ा, और यातना से भरी हुई ऐसे अपराधी के बीच नहीं देख सकता! अल्लाह की क़सम है मै अपना हाथ तुमहारे हाथ में एक हारे हुए जैसा कभी नहीं दूंगा और न ही एक गुलाम की तरह भागूंगा"!
उन्होंने (इमाम हुसैन अ:स) ऐसे आदमी के शासन को अस्वीकार कर दिया जो शासन के लायक नहीं था! इस अर्थ में वोह एक क्रांतिकारी थे, जैसा की अब वास्तव में समकालीन लेखकों द्वारा माना गया है!
प्रभाव :
यह घटना एक महान महत्त्व रखती है क्योंकि यह बताती है की शहादत (बलिदान) इस्लाम के बचाव के लिए कितना आवश्यक था, जिसने यज़ीद के सारे गलत कार्यों को उजागर कर दिया और बताया की सत्य की विजय कैसे होती है! सत्य पर रहने वाले कैसे होते हैं जैसे की उनके अनुयायी थे और उसके विपरीत गलत रास्तों पर चलने वाले कैसे होते हैं! ,
महात्मा गांधी ने 1924 में अपनी लेखनी "यंग इंडिया" में कर्बला की जंग को (और सब बातों के इलावा) ऐसे दर्शित करते हुए लिखा, " मै उसके जीवन को अच्छी तरह समझना चाहता हूँ, जो मानवजाति में सर्वोत्तम है और मानवता के लाखों दिलों पर एक निर्विवादित राज किया करता है, हुसैन की निर्भीकता,इश्वर पर अटूट विश्वास और स्वयं को बलि पर चढ़ा कर हुसैन ने इस्लाम को बचा लिया" !
यह शहादत महान थी इसका संकेत इस बात से भी मिलता है की आज दुन्या भर में सारी भाषाओं में कर्बला के साहित्य मौजूद है, जो आज भी बढ़ता ही जा रहा है! इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण मीर अनीस द्वारा लिखी गयी मर्सिया (शोक प्रदर्शित करती हुए कविता) है, जो आज भी पिछले दो शताब्दियों से विश्व की सब से लम्बी कविता (मर्सिया) का रिकार्ड है!
पृथिवी की सब से बड़ी सभा आज के समय में कर्बला में होती है जहाँ हर साल करीब 1 करोड़ (100 लाख) तीर्थ-यात्री, अर-ब'ईन के दिन कर्बला में श्रधांजलि देने इनके रौज़े (क़ब्र) पर जमा होते हैं!
इमाम हुसैन (अ:स) नाम है खुद को शानदार गुणों में सन्निहित / सम्मिलित करने क़ा, बुद्धिमता, ज्ञान, नर्तत्व, धैर्य, विनम्रता, धैर्य, और अल्लाह के स्समे अपने आप को संपूर्ण रूप से प्रस्तुत करने का और झुकाने का नाम है और इनकी ज़िंदगी प्रेरणा का एक स्त्रोत है सभी पीढ़ियों के लिए एक आदर्श का नमूना है जहाँ अन्याय और उत्पीड़न की पूर्ण रूप से निंदा की जाती है!
|
|
||