मुहर्रम

 www.world-federation.org  से सन्देश (सय्यद जाफर नकवी द्वारा अनुवादित)

इस्लाम में 'नया साल' ऐसे माना जाता है जिसे शायद कोई अन्य देश या समुदाय अपने 'नया सालको मनाते हैं!  वास्तव में, अगर सब नहीं तो ज्यादातर सभ्यताओं में इस समय लोग  खुशी और जश्न मनाते हैं और अधिकतर  पार्टियों में विभिन्न प्रकार के पापों में अपना समय व्यतीत करते हैं!  जबकि इस्लाम में, और विशेष रूप से अहलेबैत (अ:स) के मानने वालों के लिएनया साल का आरम्भ शोक और दुःख के साथ होता है, और इस समय का उपयोग भ्रष्टाचार, बुराई और पाप को दूर करने के लिए होता है न की इस्मे लिप्त होने के लिए! यह एक समय है, जिसमें हम किसी भी किस्म के अत्याचार को कम करने में व्य्यातित करते हैं चाहे वो किसी व्यक्ती विशेष पर हो या किसी समुदाय पर! इस समय का उपयोग हम अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को कम  करने और अपने  अंतरात्मा के सभी प्रकार के पापों से शुद्ध करने के में करते हैं जो हमें किसी बुराई की तरफ खींच सकती है!

यह विश्वास बेहतर तरीके से इस दुआ में समझा जा सकता है जो पैगंबर (हज़रत मुहम्मद स:अ:व:व) मुहर्रम का नया चाँद देखने में किया करते थे, जो इस प्रकार दर्शित है अल्लाह: आप पहले से मौजूद भगवान हैं,और यह एक नया साल है, और इस (नए वर्ष) में मै आप से शैतान से बचने की, और उस कमज़ोर आत्मा से जो बुराई की तरफ खींचती है उस से बचने के लिए दुआ करता हूँ, मुझे इतना व्यस्त कर दे के मै तुझ से क़रीब हो जाऊं! ऐ आलिशान, ऐ मेरे अल्लाह, हमारे दिल को सही रास्ता दिखाने के बाद मत मोड़, और अपनी मेहरबानियाँ और रहम मुझ पर रख़, क्योंकि तू ही करीम है और देने वाला है!"

वो घटना जो आशूर के आन्दोलन बनी इन्ही दो कारणों पर आधारित है - बाहरी शैतान जैसे मुआवियाह, यज़ीदऔर कुछ शुरू के ख़लीफा जिन्होंने इस्लाम को तबाह करने की नीव रखी! और दूसरी इनकी लालच और सांसारिक खाहिशात, जो हमें आज भी प्रभावित करती है, और दुखों का कारण है! हम यह यक़ीन के साथ कह सकते हैं की ईन दोनों कारणों ने एकसाथ मिलकर काम किया है! यह एक शैतानी काम है जिसने इनलोगों की अंतरात्मा को ज़रा सा ललचाया था और चूँकि इनके दिल साफ़ नहीं थे, ईन लोगों ने साथ मिलकर काम किया!

राजनितिक और भौगोलिक बदलाव के साथ, पूरा संसार बदल रहा है, इस कारण से यह महत्वपूर्ण हो जाता है की जो भी मजलिस में जाते हैं (मजलिस पढ़ने या सुन्ने) उनका कर्त्तव्य है की वो कर्बला के सन्देश को लोगों को इस तरह पहुंचाए जो सही है न की ऐसे जो सन ६१ हिजरी में यज़ीद की नापाक और तानाशाही हुकूमत में मजबूरी में किया गया! हाँ, हज़रत इमाम हुसैन (अ:स) कर्बला के मैदान में १० मुहर्रम को शहीद किये गए, लेकिन उन्हों ने भी इसका इंतज़ाम किया की उनका सन्देश किसी व्यक्ति या समय के अधीन न होकर हमेशा हमेशा के लिए दिया जाता रहे! उन्होंने हमें लगातार याद दिलाया की उनका सन्देश समय, समुदाय और सीमा विशेष के लिए नहीं बल्कि सारी दुन्या के लोगों के लिए है! उनकी ख्वाहिश यह सुनिश्चित करने की थी को जो उनके रास्ते पर होगा और अल्लाह और उसके मार्ग पर चलेगा वो हुसैनी होगा और जो उनके रास्ते पर रोक लगाएग़ा वो यज़ीदी होगा! शायद इन्ही कारणों से उन्हों ने मुहम्मद हनफिया को एक इछापत्र और आदेश (वसीयतनामा) दिया जो आज भी हमारे लिए एक मार्गदर्शक है ! इमाम (अ:स) ने कहा, " अब तुम यह जानो की निश्चित रूप से मेरा उद्देश्य किसी व्यर्थ उमंग से प्रेरित नहीं है, न ही राज्य की खोज के लिए है! मै किसी कलह को जनम नहीं देना चाहता हूँ, और न ही भ्रष्टाचार फैलाने के लिए है! मेरा लक्ष्य यह भी नहीं है की मै अन्याय करूँ! बल्कि मेरा एकमात्र उद्देश्य अपने नाना के दीन के उम्मती  (मानने वालों) में आयी हुई बुराइयों का सुधार है! मै सिर्फ अच्छाई को बताना और बुराइयों से दूर रहने को बताना चाहता हूँ और ऐसा करना मेरे निकट अपने नाना (हज़रत मुहम्मद स:अ:व:व:) अल्लाह के रसूल,  और पिता अली इब्न अबू तालिब का अनुकरण है!

आगे भी उनहोंने इस दैवी आन्दोलन की बात फिर कही, और कहा की उनका संघर्ष सारे मनुष्य जाती के लिए है! हमारे लिए यह संकेत उनकी इस कथनी में है की, " वो जो यह देखता है की कोई भी  तानाशाह के रूप में वैध को अवैध और अवैध को वैध करता हैअल्लाह के बनाये क़ानून का उलंघन करता है, नबी की सुन्नत का विरोध करता है, अल्लाह के बन्दों को पाप और उत्पीड़न के साथ दबाता है, और अपने कथनी या करनी से ऐसे सत्तारूढ़ नेता का विरोध नहीं करता है, और न ही ऐसे में सुधार की कोशिश करता है तो अल्लाह उसको वैसे ही तानाशाह के साथ जहन्नम में डाल देगा"!

इस मुहर्रम, अगर हम अबी अब्दिल्लाह (अ:स) क़ा आन्दोलन अपने दिल और दिमाग में बरक़रार रखना चाहते हैं तो हमें भी अपने होश व हवास के साथ यह सुनिश्चित करना होगा की हम अपनी ज़िन्दगी और कामों में एक नया सुधार लायेंगे! दीने इस्लाम में सुधार की ज़रुरत नहीं है, जैसा की हमारे कुछ विद्वानों का (जो सही मार्गदर्शित हैं) कहना है, और जैसा हम मानते हैं! बल्कि सुधार की ज़रुरत हमारे अपने जीवन पर लागू होती है! कर्बला के मानने वालों ने कर्बला के वाकये से यह सबक हासिल किया है सत्य की हमेशा विजय होती है, चाहे असत्य को अस्थायी रूप से यह भी लगे की वोह जीता है! 

कर्बला का सत्य जब उभर कर आया तो सन ६१ हिजरी के असत्य और अमानवीय उग्रवाद को अपने तूफानी चपेडों से इतना तहस नहस कर दिया की, उसका नाम लेबे वाला भी नहीं बचा!लेकिन जैसा की विधि का विधान है, अच्छाई के साथ बुराई भी रहती है, यही मुहर्रम सदा हमारे साथ  रहकर हमें कयामत तक याद दिलाएगा की ईन बुरायीओं को कैसे कुचलते हैं!

"अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद वा आले मुहम्मद"

कृपया यहाँ अंग्रेजी लेख के लिए पधारें http://al-islam.org/index.php?sid=417975698&t=sub_pages&cat=252

 

हुसैन (अ:स) : एक शोकपूर्ण घटना का अंत या आतंक के खिलाफ विद्रोह का आरम्भ ??

 
 

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आशूरा : विश्वास और साहस की एक सनातन (कभी न ख़त्म होने वाली)  गाथा  
लेखक : हेइदी गाविदेल, www.Press TV.com

 

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